मंजुल भारद्वाज की दो कविताएं
कविता-1
उनकी राह पर नहीं चलते !
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आज
उनको याद कर लिया
और क्या ?
बाक़ी दिन
उनके रास्ते पर
नहीं चल सकते !
हां
उन्हें याद करने की
रस्म को निभाना
नहीं भूलते !
याद करने की रस्म निभाने से
कहीं दबा छिपा विवेक
पल भर के लिए
ज़िंदा हो जाता है !
पल भर जी कर
हम मर जाते हैं
पर
उनकी राह पर
नहीं चलते !
कविता-2
ऐसा लगता है..
ऐसा लगता है
सब छूट रहा है ..
सत्य के पथ पर सत्ता ने
झूठ की कीलें ठुकवा दी हैं …
सत्य पथ पर चलने वाला
हर पथिक लहूलुहान है ….
चारों ओर …
पाखंड का नक़्क़ारा बज रहा है ..
सत्य के पथिक अपने रक्त से
सत्ता की कीलों को पुष्प बना रहे हैं …
