बात बेबात
पंक्चुअलिटी सिर्फ प्रेस रिलीज़ का विषय नही
विजय शंकर पांडेय
लोकसभा में रेल मंत्री का बयान सुनकर लगता है कि ट्रेनें नहीं, आंकड़े दौड़ रहे हैं। 77.12% से 80%—वाह! देश तरक्की कर रहा है। प्लेटफॉर्म पर खड़े यात्री भले ही दाढ़ी उगा लें, पर संसद में पंक्चुअलिटी जवान हो रही है।
उधर बस्ती की समृद्धि को ये खुशखबरी शायद ट्रेन में ही सुनने को मिली होगी—ढाई घंटे लेट होकर। परीक्षा केंद्र पहुंचने से पहले ही उसकी BSc बायोटेक की सीट ने बाय-बाय कह दिया। साल गया, भविष्य अटका और रेलवे बोला—“मैडम, 80% ट्रेनें टाइम पर थीं, आप 20% में कैसे फंस गईं?”
रेलवे की टाइमिंग बड़ी लोकतांत्रिक है। कोई प्रधानमंत्री स्पेशल हो तो मिनटों में पहुंच जाती है, कोई छात्रा हो तो “नेक्स्ट स्टेशन पर धैर्य रखें।” यहां देरी सिर्फ समय की नहीं, सिस्टम की आदत है।
अच्छा हुआ कि उपभोक्ता फोरम ने घड़ी देखी, ग्राफ नहीं। कोर्ट ने कहा—ट्रेन लेट थी, सपना भी लेट हो गया। जुर्माना लगा तो रेलवे को पहली बार एहसास हुआ कि पंक्चुअलिटी सिर्फ प्रेस रिलीज़ का विषय नहीं, जिम्मेदारी भी है।
अब उम्मीद है अगली बार आंकड़े बढ़ें या न बढ़ें, ट्रेन जरूर चले। वरना छात्र परीक्षा नहीं, अदालत की तारीख पकड़ने लगेंगे। और रेलवे फिर गर्व से कहेगा—“न्याय में देरी नहीं, बस थोड़ा ठहराव है।”
