संगठन पर नव उदारवादी नीतियों के प्रभाव 

समकालीन चुनौतियां और आगे का रास्ता

संगठन पर नव उदारवादी नीतियों के प्रभाव

सत्यपाल सिवाच

अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी यानी नव उदारवाद का दौर केवल आर्थिक क्षेत्र में ही शोषण नहीं करता है, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी प्रभाव डालता है। सन् 2022 में ट्रेड यूनियनों के स्तर पर किए गए अध्ययन में नोट किया गया है कि पिछले कुछ वर्षों से मध्यवर्गीय कर्मचारियों में संघर्षों के प्रति लगाव में कमी आई है। इसके कारणों की गहराई से पड़ताल करके उपाय किए जाने चाहिएं। ऐसे ही कुछ मुद्दे जिन्हें ठीक संदर्भ के साथ समझना होगा वे इस प्रकार हैं :

अराजनीतिक होने का मुद्दा :

बहुत पहले से ही कहा जाता रहा है कि यूनियन को अराजनीतिक होना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कर्मचारियों के राजनीति में भाग लेने के नागरिक अधिकार पर रोक लगाने का क्या औचित्य है? एक वर्ग के रूप में सत्ता हमारे बारे में जो निर्णय ले रही है उनके पीछे क्या नीति है और उस नीति को कौन सी राजनीति कैसे देखती है? यह जानना-समझना हमारे लिए जरूरी है, क्योंकि उसे समझे बिना लड़ेंगे कैसे? वास्तव में अराजनीतिक होने का प्रचार इस भावना से किया जाता है कि अपने साथ किए जा रहे अन्याय की पटकथा को न समझ सकें। साथ ही राजनीति से प्रेरित बताकर आन्दोलनों की उपेक्षा व दमन करना भी शासन की कार्यनीति में शामिल है।

पहचान की राजनीति :

पूंजीवाद ने वैचारिक हमला तेज करते हुए ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ और हाल ही में ‘पोस्ट ट्रुथ’ का सिद्धांत दिया। आधुनिकता का विचार वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है। इसलिए उससे परे ‘कुछ और है’ कहकर नया विचार दिया गया है। इसके अनुसार कोई वर्ग नहीं होता, समस्या और उसका समाधान स्थानीय/सूक्ष्म स्तर (micro level) पर हो सकता है। जिस समुदाय की समस्या है वही उसे उठाए तो समाधान होगा। दूसरों का उससे कोई मतलब नहीं होता। इस विचार को पोषित करके लोगों को संकीर्ण पहचान के आधार पर बांटने का काम चल रहा है। इसका प्रभाव दिख भी रहा है। जाति आधार पर संगठन, कैटेगरी आधार पर संगठन, भर्ती के वर्ष के आधार पर संगठन, ‘गेस्ट इज द बेस्ट’ का नारा, ‘एक ही मांग – ओपीएस अथवा 35400’ नारे आदि अनेकों ठोस उदाहरण हैं। देखते-देखते रोडवेज में कितने संगठन खड़े हो गए। अनेक संगठनों में विभाजन को एक प्रवृति की तरह देख सकते हैं। इसके चलते लड़ने की शक्ति घटती है। कई बार एक हिस्सा सरकार के साथ खड़ा हो जाता है। इसलिए हमें संकीर्ण पहचान की बजाय वर्गीय पहचान के आधार व्यापक एकता कायम करनी होगी।

कर्मचारी/मजदूर न होने का भ्रम :

नये पदनाम, काम की शर्तों, वर्क फ्रॉम होम, ऑउटसोर्स अथवा प्रोजेक्ट आदि कामों से यह भ्रम पैदा हो जाता है कि हम कर्मचारी या मजदूर नहीं हैं, बल्कि प्रशासन या प्रबंधन का हिस्सा हैं। अथवा हम किसी के मातहत काम नहीं कर रहे, बल्कि अपना ही काम कर रहे हैं। करना चाहें तो करें, न चाहें तो छोड़ दें। ऐसे कर्मचारियों में युवाओं की बहुत बड़ी संख्या है जो काम बदलने में तरक्की देखते हैं या जिन्हें विश्वास है कि अच्छे काम के आधार पर पदोन्नति मिल जाती है। वे संघर्ष से दूर ही रहते हैं। महिलाएं भी अच्छी संख्या में नौकरी में हैं और उन्हें अधिक कार्यभार के अलावा यौन उत्पीड़न भी झेलना पड़ता है, लेकिन संगठन आमतौर पर ऐसे सवालों को नहीं उठाते।

कच्चे कर्मचारियों को आन्दोलन में आने पर नौकरी से निकाल दिये जाने का भय भी रहता है। आई टी या अन्य मामलों में सीधे मालिक दिखाई भी नहीं देता। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के आने पर स्थिति नयी चुनौतियां लेकर आएगी। ऐसे कर्मचारियों को छुट्टी के बाद या अवकाश के दिन आवास की जगह संगठित किया जा सकता है। वहाँ इनकी नागरिक सुविधाओं व नौकरी संबंधी – दोनों ही प्रकार की समस्याएं उठानी होंगी।

परम्परागत मध्यम वर्ग में कर्मचारी व शिक्षक भी शामिल किये जाते हैं। इन तबकों में बच्चों की अच्छी शिक्षा, प्लेसमेंट, बाहर भेजने, शहरों की पॉश कालोनी में मकान बनाने आदि के लिए भी दबाव बढ़ा है। इनकी चिंताओं में जमीन की बढ़ती कीमत, ऋण भुगतान की किस्तें, बदलती ब्याज दरें, आयकर, यूजर चार्जिज, निजी चिकित्सा, पैट्रोल की बढ़ती कीमतें शामिल हैं। इनमें से बड़ा हिस्सा अब नौकरी के बाद का समय यूनियन, समाज या सामूहिक कामों में नहीं लगाता, बल्कि अतिरिक्त कमाई के लिए अपने व्यवसाय से सम्बन्धित या असम्बन्धित कार्य करता है। उन पर परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने का दबाव रहता है।

आई टी व सेवा क्षेत्र में समय पर काम निपटाने और उच्च मानकों के साथ निपटाने का भी भारी दबाव रहता है। इस वजह से उन्हें 10 – 12 घंटे प्रतिदिन काम करना पड़ता है। निजी जीवन व परिवार के लिए भी समय नहीं बचता। ऐसे कर्मचारियों में यूनियन के प्रति कोई रूझान नहीं होता।

मध्यम वर्ग पर खर्चों के बढ़ते बोझ, जिसमें बच्चों की अच्छी शिक्षा के चक्कर में महंगे प्राइवेट स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग, यहां तक कि विदेश में शिक्षा की चिंताएं भी शामिल हैं। बच्चों में अनेक मौकों पर पार्टी करने, ब्रांडेड कपड़े व सामान खरीदने आदि का भी रूझान है। बढ़ते खर्च दबाव में कर्ज लेना पड़ता है और कुछ मामलों में प्रापर्टी तक बेचने की नौबत आ जाती है। ये लोग वृद्धावस्था में निराशा और एकाकीपन का शिकार हो जाते हैं जिसके चलते मिलकर लड़ने का सामर्थ्य खो देते हैं।

सामाजिक उत्पीड़न :

आर्थिक-भौतिक-तकनीकी तरक्की के बावजूद समाज में जाति, लिंग अथवा साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव भी है और कमजोर व कम संख्या वाले लोगों का बहिष्कार व उत्पीड़न भी। आमतौर पर कर्मचारी संगठन ऐसे मुद्दों पर खामोश रहते हैं और बाइपास निकलने की चेष्टा करते हैं। आरक्षण के सवाल पर ऐसा बहुत बार सामने आया है। महिला उत्पीड़न पर तो सामान्यतः जबान का ताला खुलता ही नहीं। ऐसे में उत्पीड़ित समुदाय के कर्मचारी आन्दोलन की मुख्यधारा के प्रति उदासीन हो जाते हैं। इन सवालों पर न्याय के पक्ष में स्टैंड लेने से आन्दोलन की ताकत बढ़ती है।

राष्ट्रवाद

भारतवर्ष में राष्ट्रवाद का विकास साम्राज्यवाद के खिलाफ आजादी की लड़ाई के दौरान उभरा था। भाजपा के केन्द्र व राज्य में सत्ता में आने बाद से राष्ट्रवाद को भी साम्प्रदायिक प्रचार का हथियार बना लिया है। साम्राज्यवाद के साथ तो मिलीभगत चल रही है लेकिन पाकिस्तान का बहाना लेकर एक समुदाय को निशाना बनाया जाता है। वे राष्ट्र को धर्म से जोड़कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहते हैं और अपने ही देशवासियों को देशद्रोही कहकर वैमनस्य जगाते हैं। कर्मचारी भी इस प्रचार से भ्रमित होकर लुटेरी व्यवस्था के समर्थक और प्रशंसक बन जाते हैं। हमें अपने देशहित के संदर्भ में राष्ट्र और देशप्रेम को ग्रहण करना चाहिए, न कि साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने के षड्यंत्र के रूप में।

 मजदूर-किसान-कर्मचारी एकता :

किसान आन्दोलन ने देश में नयी परिस्थिति पैदा कर दी है। इसने सत्ता के वर्ग चरित्र और लूट को बेनकाब कर दिया ; इसने एकता तोड़ने की साजिशों को समझ लिया और असफल बना दिया ; इसने व्यापक एकता की जरूरत को स्थापित करते हुए जाति, धर्म, क्षेत्र आदि की संकीर्ण दीवारों पर चोट मारी और उन्हें कमजोर कर दिया; इसने सांस्कृतिक स्तर पर काम करते हुए अपनी भावनाओं को गीतों व अन्य विधाओं में संजोया। महिलाओं और युवाओं के आन्दोलन में आगे बढ़कर केन्द्रीय मंच पर आने का अवसर प्रदान किया। सबसे बड़ी यह बात स्थापित हुई कि एकताबद्ध होकर दुश्मन की और अपनी ताकत का सही आकलन करते हुए लड़ा जाए तो हमारी जीत निश्चित है। कर्मचारियों को भी अपने संघर्षों के लिए लोगों के बीच जाकर समाज से ऊर्जा लेनी चाहिए।

कर्मचारी आन्दोलन को अपनी मांगों या मुद्दों को उपरोक्त चर्चा के आधार पर पहचानना और तय करना चाहिए। जैसे यदि स्कूल शिक्षा अधिनियम-2003 की धारा 134 ए अथवा चिराग के तहत दाखिले की मांग करते हैं तो इसका अर्थ है कि बच्चे को सरकारी स्कूल छोड़कर प्राइवेट स्कूल में जाने का समर्थन कर रहे हैं। इसी तरह कैशलेस चिकित्सा सुविधा का मतलब है हम सरकारी अस्पताल की बजाय निजी अस्पताल में ईलाज को बढ़ावा दे रहे हैं। हमें अपने मांगपत्र को तात्कालिक प्रलोभन की बजाय नीतियों के साथ जोड़कर समझना चाहिए। जो मांग सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ाये वो उठाएं और जो उसे कमजोर करे उसे छोड़ दें। ऐसा ही एक सवाल संगठन के बारे में है। यदि कोई कहे कि सर्वकर्मचारी संघ तो सभी की बात करेगा। हम केवल अपनी बात करें। इसका अर्थ है कि आपकी लड़ने की ताकत घट जाएगी। वह हम क्यों माने? कोई कहे, हमें किसानों से क्या लेना है? इसका मतलब है कि हम मौजूदा नीतियों के खिलाफ व्यापक एकता की जरूरत महसूस नहीं करते। यही तो शासन चाहता है। अलग अलग होकर लोग लड़ेंगे तो सरकार का मुकाबला करना मुश्किल होगा। हमारी समझ साफ हो, हम जनहित के लिए नौकरी में हैं। हमारी मांग और आचरण जनसेवाओं की गुणवत्ता और विस्तार पर केन्द्रित होना चाहिए।

(पुस्तक अंश – “संघर्ष गाथा – हरियाणा कर्मचारी आन्दोलन”)

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