कर्मचारी आन्दोलन के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे

समकालीन चुनौतियां और आगे का रास्ता

कर्मचारी आन्दोलन के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे

सत्यपाल सिवाच

समसामयिक महत्व के मुद्दों को देखें तो सबसे पहले कच्चे कर्मचारियों को पक्का करना ही अहम् मांग है। सभी प्रकार के कच्चे कर्मचारियों की सेवाएं नियमित होने तक सेवा सुरक्षा, नियमित कर्मचारी के समान वेतन, भत्ते, इंक्रीमेंट आदि मिलें। स्थायी प्रकृति के कार्यों के लिए स्थायी भर्ती ही हो। यदि कार्यभार के आधार पर कच्ची भर्ती करने की नौबत आए तो सम्बन्धित विभाग करें। इसलिए कौशल रोजगार निगम को भंग किया जाए। सरकार ने कच्चे कर्मचारियों को एचकेआरएन और सेवा सुरक्षा का लालच देकर वोट ले लिये, लेकिन सत्ता हथियाने के बाद उन्हें लतिया दिया। पहले से कार्यरत कर्मचारियों का समायोजन अपने आप में बड़ा मुद्दा बन जाता है। वास्तव में तो कच्चे कर्मचारियों को सोशल सिक्युरिटी एक्ट-2020 के तहत लाभ मिलने चाहिएं लेकिन लेबर कोड के जरिए इन्हें निष्प्रभावी बनाया जा रहा है।

कर्मचारियों के समक्ष आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर के आधार पर *राज्य के लिए अलग वेतन आयोग का गठन* भी बड़ा मुद्दा है। सन् 1986 से 2016 तक केन्द्रीय वेतन आयोगों की सिफारिशों को आंशिक रूप से लागू किया जाता रहा है। हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है और उसी के अनुरूप जीवन निर्वाह का न्यूनतम खर्च भी अधिक है। कर्मचारियों की कुछ ऐसी श्रेणियां भी हैं जो केन्द्र सरकार में नहीं हैं। ऐसे में राज्य के कच्चे-पक्के कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए अलग वेतन आयोग गठित करना महत्वपूर्ण है।

एनपीएस वाले कर्मचारियों की संख्या बड़ी हो गई है। उन्हें पेंशन लाभ उस समय तक जमा हुई पूंजी पर साधारण ब्याज दर के अनुरूप ही मिलेगा। यह राशि भविष्य की सुरक्षा के लिए आश्वस्त करने हेतु बहुत कम है। कर्मचारी और नियोक्ता दोनों का अंशदान शेयर बाजार की विभिन्न स्कीमों में निवेश किया जाता है जिसमें जोखिम होने की चेतावनी भी साथ ही दी जाती है, लेकिन निवेश कहाँ किया जाए, इसके बारे में अंशदाता से नहीं पूछा जाता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पेंशन का सवाल सार्वभौमिक बन गया है। एक आयु सीमा के बाद सभी नागरिकों को बुढ़ापा सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन निर्वाह के लिए पेंशन मिलनी चाहिए। सरकार दो दशक से अपने कर्मचारियों की पेंशन बंद करके एनपीएस में ले आई थी। यह छलावा मात्र है। कर्मचारियों की बचतों को बाजार आधारित शेयरों में लगाना और साठ वर्ष की आयु पूरी होने पर बचे हुए धन के साठ प्रतिशत का भुगतान कर देना। शेष बची हुई चालीस प्रतिशत राशि पर औसत ब्याज की राशि के बराबर पेंशन देना। पुरानी पेंशन बहाली के बड़ा मुद्दा बन जाने पर यूपीएस नाम से नयी कपट-लीला प्रचारित की जा रही है। इसके तहत पेंशन की राशि थोड़ा बढ़ा देंगे लेकिन साठ वर्ष की आयु मिलने वाली राशि छोड़नी पड़ेगी। इसलिए बिना शर्त पुरानी पेंशन की बहाली हो तथा पीएफआरडीए में जमा की गई राशि राज्यों को वापस दी जाए, यह बड़ा मुद्दा है।

पेंशनर्स की कम्युटेशन राशि की वसूली का समय दस साल करना और 65, 70 और 75 वर्ष की आयु पर पेंशन बढ़ाना भी अहम् मुद्दे हैं। दिनांक 25.03.2025 को संसद में पेंशनर्स को कर्मचारियों से अलग करने के लिए कानून पारित करवाया है। जिसे लेकर पेंशनर्स को नये वेतन आयोग द्वारा की जाने सिफारिशों के लाभ से वंचित किये जाने की आशंका है। हालांकि आधिकारिक रूप से सरकार ने ऐसी आशंका को निर्मूल बताया है।

स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। चिकित्सा पूरी तरह मुफ्त करने व पूरे खर्च की भरपाई करने के प्रावधान की जगह बीमा आधारित पैकेज दिए जा रहे हैं। इसका अर्थ है सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप्प हो जाएंगी और बीमा की सीमा से अधिक खर्च कर्मचारी को खुद उठाना पड़ेगा। कच्चे कर्मचारियों की चिकित्सा का जिम्मा तो सरकार लेती ही नहीं है।

यदि कुछ पद ज्यादा वेतन वाले हैं तो वहाँ एकमुश्त वेतन की अदायगी ही है, अन्य सुविधाएं या भविष्य की सुरक्षा नहीं। इसीलिए सभी के लिए *नकद भुगतान रहित (Cash less)* चिकित्सा भी लोकप्रिय मुद्दा बना हुआ है। वास्तव में यह सार्वजनिक चिकित्सा सेवाओं के विस्तार से जुड़ा हुआ है। सरकार और कर्मचारियों का एक हिस्सा इसे पैनल हस्पतालों के खर्च के भुगतान के रूप में देखता है।

आयुष्मान पोर्टल पर कर्मचारियों और पेंशनर्स का पंजीकरण करवाए जाने की शुरुआत से आशंका पैदा हो गई है। चिकित्सा खर्च के पूरे भुगतान के पहले से मौजूद प्रावधान को किसी प्रकार से सीमित करने की कोशिश या चिकित्सा बीमा से जोड़ने की कोशिश अनुचित है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता इतनी बढ़ाई जाए कि सभी नागरिकों को नि:शुल्क अच्छी चिकित्सा मिल सके। सरकारी अस्पताल में सेवा उपलब्ध न होने पर निजी अस्पताल में जाने पर भी पहचान पत्र दिखाकर कैशलेस ईलाज किया जाए।

समयबद्ध पदोन्नति का विचार हमारे आन्दोलन के शुरुआती दौर में उभर आया था। नब्बे प्रतिशत से अधिक कर्मचारी उसी पद से रिटायर हो जाते थे जिस पर भर्ती होते थे। अनेक श्रेणियों के लिए तो पदोन्नति के लिए पद ही नहीं थे और जहाँ थे वहाँ भी कम अवसर थे। पैंतीस से चालीस साल तक एक ही पद पर काम करते जाने से कर्मचारियों की दक्षता और ऊर्जा दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था।

सन् 1987 में जब यह मांग उठाई गई तो बहुतों को अटपटी लगती थी लेकिन बाद में जब दस व बीस वर्ष की सेवा पर अतिरिक्त वेतनवृद्धि दी गई तो इसका औचित्य समझ आने लगा। संघर्षों में इस मांग के बने रहने के चलते आठ व अठारह वर्ष की सेवा पर वेतनवृद्धि, फिर हॉयर स्टेंडर्ड पे स्केल और 10, 20 व 30 वर्ष की सेवा पर तीन एसीपी दिए जाने लगे। सन् 2014 में 8, 16 और 24 वर्ष की सेवा पर एसीपी दिलवाने में सफलता मिली। पिछले कुछ सालों से एसीपी के मामले में कुछ नकारात्मक शर्तें जोड़ दी गई हैं। जैसे पदोन्नति से इन्कार करने पर एसीपी वापस लेना अथवा पदोन्नति पद की योग्यता पूरी न करने पर एसीपी न देना।

इसके अलावा एसीपी पदोन्नति वाले पद का वेतनमान नहीं हैं, बल्कि उससे कम दिए गए हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक पाँच (5, 10, 15 आदि) वर्ष की सेवा पर पदोन्नति वेतनमान दिए जाएं ; ये पदोन्नति वाले पद के वेतनमान हों तथा इसके लिए योग्यता सम्बन्धी नयी शर्तें न जोड़ी जाएं। यह आज के दौर में महत्वपूर्ण मांग है।

भर्ती नीति भी आज के समय का अहम् मुद्दा है। सेवाओं के मानकों और आबादी के अनुपात में नये पद स्वीकृत किए जाएं। कच्चे कर्मचारियों की सेवाएं नियमित करने के बाद बचे हुए पदों पर अकादमिक मेरिट से नियमित भर्ती की जाए। नयी भर्ती करते समय संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था का ध्यान रखा जाए। यदि कहीं बैकलॉग है तो उसे अवश्य पूरा किया जाए। भले ही नयी भर्ती की मांग मौजूदा कर्मचारियों से सम्बन्धित न दिखाई दे, लेकिन यह तीन स्तरों पर अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है।

पहला, जरूरत के मुताबिक नयी भर्ती होगी तो अनावश्यक कार्यभार नहीं बढ़ेगा ; दूसरा, सरकार आन्दोलन की पिटाई के लिए बेरोजगार युवाओं को कर्मचारियों के खिलाफ भड़का नहीं पाएगी और तीसरा, देश-प्रदेश की भावी पीढ़ी को सम्मान से निर्वाह के लिए रोजगार मिल सकेगा।

इनके अलावा भी कर्मचारियों के श्रेणी वार या विभागीय स्तर के मुद्दे हो सकते हैं जिनका समाधान करने के लिए सरकार और विभागाध्यक्ष के स्तर पर द्विपक्षीय वार्ता का स्थायी ढांचा बनाया जाना चाहिए।

कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं जिन्हें हल किए बिना समस्याएं खड़ी रहेंगी। इनमें लोकतांत्रिक और ट्रेड यूनियन अधिकारों का मसला अहम् है। संगठनों को मान्यता देने, गुप्त मतदान से प्रतिनिधियों का चयन और निर्णयकारी जगहों पर कर्मचारियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित हो। यूनियन बनाने के अधिकार, कर्मचारी आचरण नियमावली, चार लेबर कोडस् के जरिए यूनियन बनाने, संघर्ष करने के अधिकार रोक लगाने और सोशल सिक्युरिटी एक्ट-2020 का लाभ न देने का कुप्रयास किया गया है।

संविधान की धारा 310 और 311(2) ए.बी.सी. बिना जाँच कर्मचारियों को बर्खास्त करने का अधिकार देती है। इसी प्रकार सम्पत्ति क्षतिपूर्ति कानून और शव सम्मान कानून को भी आन्दोलन की पिटाई के लिए दुरुपयोग किए जाने की आशंका है। आर्थिक मांगों के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल कर्मचारी आन्दोलन के महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल रहने चाहिएं।

(पुस्तक अंश : “संघर्ष गाथा – हरियाणा कर्मचारी आन्दोलन”)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *