क्या ‘वेटिंग फॉर वीज़ा’ आत्मकथा है?

क्या ‘वेटिंग फॉर वीज़ा’ आत्मकथा है ?

    कँवल भारती

 

डा. अम्बेडकर की एक छोटी सी पुस्तिका ‘वेटिंग फॉर वीज़ा’ को डा. आंबेडकर की आत्मकथा के रूप में प्रचारित किया जाता है, जबकि यह गलत प्रचार है। पंद्रह पृष्ठों की यह पुस्तिका वसंत मून द्वारा सम्पादित ‘डा. बाबासाहेब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस’ के वाल्यूम 12 में संकलित है। इसके परिचय में स्वयं डा. आंबेडकर ने लिखा है, ‘विदेशियों को यह तो पता है कि भारत में अस्पृश्यता मौजूद है, परन्तु वे उसके निकट सम्पर्क में न आने के कारण यह नहीं जानते कि यह कितनी दमनकारी है। उनके लिए यह समझना मुश्किल है कि हिन्दू आबादी वाले गाँवों में अलग-थलग रहने वाले अछूतों के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार होता है?

समस्या यह है कि अछूतों के साथ हिन्दुओं की अमानवीय व्यवहार की इन घटनाओं को किस रूप में दर्ज किया जाए? उनको दर्ज करने के दो तरीक़े हैं, जिससे यह मक़सद पूरा हो सकता है। पहला सामान्य वर्णन और दूसरा अस्पृश्यता की घटनाओं का विवरण। मुझे पहले तरीक़े की अपेक्षा दूसरा तरीक़ा ज्यादा प्रभावशाली लगता है। इसलिए यहाँ मैंने कुछ अपने अनुभवों से जुड़ीं घटनाओं को लिया है, और कुछ दूसरे लोगों के अनुभवों को लिया है। मैं आरम्भ उन घटनाओं से करता हूँ, जो मेरे जीवन में घटी हैं।’ (पृष्ठ 663)

इससे स्पष्ट है कि ‘वेटिंग फॉर वीज़ा’ में आंबेडकर ने अस्पृश्यता की उन घटनाओं को दर्ज किया है, जो कुछ उनके और कुछ अन्य अछूतों के साथ घटी थीं। यह उनकी आत्मकथा नहीं है, बल्कि यह वह संग्रह है, जिसे संस्मृतियाँ कहा जा सकता है। यह लेखन उन्होंने विदेशियों को अस्पृश्यता का भयावह रूप दिखाने के लिए किया था।

मैंने इसका अनुवाद उस समय किया था, जब अंग्रेज़ी वाल्यूम-12 हिन्दी में अनूदित होकर नहीं आया था, और हिन्दी पाठकों को इस कृति की जानकारी लगभग न के बराबर थी। इसका कोई हिन्दी अनुवाद भी उस समय तक मेरी जानकारी में नहीं था। मेरा अनुवाद 2006 में डा. आंबेडकर के पावन जन्मदिन के अवसर पर विकास राय द्वारा साहित्य उपक्रम से छापा गया था। मैंने अपनी भूमिका में इसे ‘अस्पृश्यता के रेखाचित्र’ के रूप में दर्ज किया है। इस अनुवाद के साहित्य उपक्रम से कई संस्करण हो चुके हैं, और कुछ अन्य प्रकाशकों ने भी मेरी अनुमति से इसे प्रकाशित किया है।

‘वेटिंग फॉर वीज़ा’ के माध्यम से डा. आंबेडकर कहना चाहते हैं कि दलित जातियाँ, वे जातियाँ हैं, जिन्हें हिन्दू समुदाय में प्रवेश नहीं मिला है। दलित अपने आपको भले ही हिन्दू मानते हैं, हिन्दू तीज-त्यौहार भी मनाते हैं, पर सच्चाई यह है कि उनको एक हिन्दू के रूप में आज तक स्वीकार नहीं किया गया है। उन्हें हिन्दू समुदाय में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली है। वे अभी भी प्रवेश और अनुमति की प्रतीक्षा में हैं। लेकिन यह प्रतीक्षा व्यर्थ है, क्योंकि दलित जातियाँ हिन्दू समुदाय की अंग नहीं हैं।

विकास राय ने इस कृति का बहुत सुंदर परिचय लिखा है। यह अंश देखिए, ‘डा. भीमराव आंबेडकर ने दलित समुदाय के नागरिकों को हिन्दूधर्म के मुहाने पर, प्रवेश की अनुमति के लिए अंतहीन प्रतीक्षा में पाया है। यह प्रतीक्षा समुदाय के उन सदस्यों के लिए भी उतनी ही अपमानजनक है, जो अन्यथा धन या शिक्षा से सम्पन्न भी हो चुके हैं। यहाँ तक कि दलितों के प्रति जो रवैया व्यापक हिन्दू समुदाय का है, वही अन्य धर्मावलम्बियों में भी मिलता है।’

एक अनुवादक के रूप में मैंने ‘छुआछूत की पीड़ा’ नाम से भूमिका लिखी है, जिसके कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं—

‘वेटिंग फॉर वीज़ा’ में डा. आंबेडकर द्वारा प्रस्तुत कुछ अपने और कुछ अन्य लोगों के अनुभवों को पढ़ते समय हिन्दू समाज की अस्पृश्यता की क्रूर व्यवस्था को देखने और समझने का एक अवसर मिलता है। यह वह व्यवस्था है, जो एक विशाल समुदाय को हिन्दुत्व से बाहर रखती है। यह व्यवस्था दलितों को हिन्दू समाज में मिश्रित होने से रोकती है। यह व्यवस्था इस सत्य को रेखांकित करती है कि दलित जातियाँ हिन्दू नहीं हैं। आंबेडकर के इस कथन में कितनी सत्यता है कि ईसाईयों ने यहूदियों पर इसलिए ज़ुल्म किए थे, क्योंकि वे ईसाईयों के साथ मिश्रित होकर रहना नहीं चाहते थे। लेकिन भारत में हिन्दू इसलिए दलितों पर ज़ुल्म करते हैं, क्योंकि वे हिन्दुओं के साथ मिश्रित होकर रहना चाहते हैं। है न विडम्बना!

‘ये छह रेखाचित्र छह घटनाएँ हैं। पहली घटना आंबेडकर के जीवन में तब घटी थी, जब वह नौ साल के थे। इस घटना ने उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था। आंबेडकर ने एक स्थान पर लिखा है कि ग़रीब होना उतना बुरा नहीं है, जितना अछूत होना। ग़रीबी मिटाई जा सकती है, पर अछूतपन को नहीं मिटाया जा सकता। आंबेडकर के जीवन में यह घटना तब घटी थी, जब वह ग़रीब नहीं थे। गोरेगांव जाने के लिए उन्होंने नए कपड़े, नए जूते और नई टोपी ख़रीदी थी। पास में रूपये थे और सोने के ज़ेवर भी थे। पर यह धन उनका अछूतपन नहीं मिटा सका था। स्टेशन मास्टर की सिफ़ारिश पर गाड़ीवान ने दुगुना भाड़ा लेने के बाद भी गाड़ी ख़ुद चलाने और उसमें बैठने से इनकार कर दिया था। गाड़ी को ख़ुद बालक भीम ने हांका था। चुंगी अधिकारी ने पानी देने से मना कर दिया था, जिसके कारण खाना होते हुए भी उन्हें अपने भाइयों के साथ रात में भूखा सोना पड़ा था।

‘दूसरी घटना 1916 की है, जब डा. आंबेडकर लन्दन से बीच में ही पढ़ाई छोड़कर, बड़ोदा नरेश की शर्त पर नौकरी के लिए बड़ौदा आए थे। पर ठहरें कहाँ? राजा ने उनके ठहरने की व्यवस्था नहीं की थी। हिन्दू होटलों में उन्हें जगह नहीं मिली, और न किराए पर किसी ने कमरा दिया। अंतत: वह एक पारसी सराय में यह सोचकर गए कि पारसी धर्म छुआछूत को नहीं मानता है। पर वहाँ भी उनको छुआछूत का सामना करना पड़ा। सराय के मेनेजर ने उन्हें पारसी समझकर कमरा दे दिया, जहाँ वह ग्यारह दिन रहे, पर आंबेडकर के पास पारसियों का चिन्ह ‘सांद्रा कश्ती’ नहीं थी, जिससे उनके अछूत होने का भेद खुल गया। दर्जन भर गुस्साए पारसियों ने सराय में घुसकर उनके साथ अभद्रता की और उन्हें सराय छोड़नी पड़ी। निराश होकर वह उसी दिन बम्बई वापस लौट गए। इस घटना ने आंबेडकर को यह सोचने को मजबूर कर दिया कि जो व्यक्ति हिन्दुओं के लिए अछूत है, वह पारसियों के लिए भी अछूत है। और उच्च शिक्षा भी किसी दलित को अछूतपन से मुक्त नहीं कर सकती।

‘तीसरी घटना 1929 की है। चालीस गाँव के अछूतों ने यह सोचकर आंबेडकर को एक ताँगे में बैठा दिया था कि उनके नेता को पैदल ले जाना गरिमा के ख़िलाफ़ होगा। ताँगा चालक अनाड़ी था। उसकी लापरवाही से घोड़ा ग़लत दिशा में मुड़ गया और नदी में गिर गया। आंबेडकर उछलकर पत्थरों पर गिर पड़े थे, जिससे उनकी टांग टूट गई थी, और कई जगह चोटें आई थीं। असल में, ताँगे वाले ने ताँगा तो किराए पर दे दिया था, पर एक अछूत को बैठाकर ख़ुद ताँगा चलाने से उसने मना कर दिया था। उस वक़्त आंबेडकर बंबई सरकार की एक जांच समिति के सदस्य थे और एक गाँव में सामाजिक बहिष्कार की घटना की जांच करने गए थे।

‘चौथी घटना 1934 की है, जब पूना-पैक्ट हो चुका था। आंबेडकर अपने कुछ दलित साथियों के साथ दौलताबाद का क़िला देखने गए थे। रमजान का महीना था। किले के गेट के बाहर पानी से भरा हुआ एक हौज रखा हुआ था। आंबेडकर के साथी लारी से आए थे, तो रास्ते की धूल से उनके चेहरे सन गए थे। अन्दर जाने से पहले उन्होंने हौज के पानी से अपने हाथ-मुँह धो लिए थे। बस तभी एक सफ़ेद दाढ़ी लहराता हुआ बूढ़ा मुल्ला दौड़ा-दौड़ा आया, और चिल्लाने लगा, ‘इन ढेढ़ों ने हौज को गंदा कर दिया है।’ आवाज़ सुनकर और भी मुसलमान इकट्ठे हो गए। वे सब आंबेडकर और उनके साथियों को गन्दी-गन्दी गालियाँ देने लगे। ढेढ़ अपनी औकात भूल गए। इन्हें सबक सिखाना होगा। बाद में अधीक्षक ने उनको इस हिदायत के साथ क़िला देखने की इजाजत दी कि वे कहीं भी कुछ छुएंगे नहीं। एक हथियारबंद सुरक्षाकर्मी उनके साथ भेजा गया, जिससे वे हिदायत की अनदेखी न कर सकें। आंबेडकर की टिप्पणी गौरतलब है कि जो व्यक्ति हिन्दुओं के लिए अछूत है, वह मुसलमानों के लिए भी अछूत है।

‘शेष दो घटनाओं के अनुभव दो अलग-अलग व्यक्तियों के हैं। एक अनुभव एक अछूत अध्यापक का है, जिसकी बीमार पत्नी का डॉक्टर ने इलाज करने से मना कर दिया था, और वह मर गई थी। छुआछूत को बनाए रखने के लिए वह हिन्दू डॉक्टर अपने पेशे की आचार-संहिता भूल गया था। अध्यापक अछूत था, पर ग़रीब नहीं था। वह डॉक्टर की फीस दे चुका था। इस घटना के संदर्भ में कल्पना कीजिए, यदि सब कुछ वैसा ही होता, और लोकतंत्र में दलितों को अधिकार न मिलते, तो आज कितनी भयानक स्थिति होती। दलितों के पास धन होता, पर वे अपना जीवन नहीं बचा सकते थे।

‘दूसरी और अन्तिम घटना कालीराम परमार (मेहतर) युवक के साथ घटी थी। अहमदाबाद के एक तालुका में तलाती के पद पर उसकी नियुक्ति हो गई थी। जब वह ज्वाइन करने पहुंचा, तो पहले ही दिन उसे अपमान सहना पड़ा। बाबू ने कहा, ‘हरिजन है, दूर हटकर खड़ा हो, पास खड़े होने की हिम्मत क्यों की? यदि तू बाहर होता, तो तुझे छह लातें मारता।’ इतने अपमान के बाद एक शिक्षित युवक की क्या हालत हो सकती है? उसे रोज यह अहसास कराया गया कि तेरे माँ-बाप झाड़ू लगाते हैं और तू दफ्तर में हमारे बराबर बैठने की हिम्मत करेगा?’ उसे नौकरी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया गया। एक दिन वह खाली पड़ी कुर्सी पर बैठ गया, तो बाँभनों ने उसे लाठियों से इतना मारा कि उसे जान बचाकर भागना पड़ा।

‘यह महसूस किया जा सकता है कि आज लोकतंत्र में संविधान के तहत दलित जातियों को जो गरिमा और मानवीय अधिकार प्राप्त हैं, उसके पीछे दलितों के इस संघर्ष की भी एक बड़ी भूमिका है। हिन्दू उन्हें अपने बराबर लाने के लिए आज भी पक्ष में नहीं हैं। हिन्दू राष्ट्र बनाने और संविधान खत्म करने की आवाजें इसी मकसद से हैं।

‘महत्वपूर्ण यह नहीं है कि इन रेखाचित्रों की आज कितनी प्रासंगिकता है? महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय समाज को लोकतान्त्रिक बनाने की दिशा में अस्पृश्यता के ये दंश दलितों के संघर्ष को रेखांकित करते हैं।’ (पृष्ठ 3-5)

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