समानांतर सिनेमा
सुवर्ण रेखा : विस्थापन का असहज सत्य दिखाती फिल्म
उर्वशी
ऋत्विक घटक की “सुवर्णरेखा” एक फिल्म नहीं, भारतीय इतिहास की उस दरार में झाँकने की प्रक्रिया है जहाँ से रक्त नहीं, स्मृतियाँ रिसती हैं। यह उनकी “विभाजन त्रयी” की सबसे मार्मिक, सबसे बेचैन कर देने वाली कड़ी है — ऐसी कृति, जो दर्शक को कहानी नहीं सुनाती, बल्कि उसे इतिहास की ठंडी राख पर नंगे पाँव चलने को विवश कर देती है। यहाँ विभाजन भूगोल की रेखा नहीं, आत्मा की दरार है; सीमाएँ नक्शों पर नहीं, मनुष्यता की चेतना पर खिंची हुई हैं। इसीलिए यह फिल्म देखी कम, भीतर कहीं गहराई में सुनी अधिक जाती है — जैसे किसी दबे हुए रुदन की प्रतिध्वनि।

1947 के महाविस्थापन की पृष्ठभूमि में ब्राह्मण युवक ईश्वर चक्रवर्ती अपनी छोटी बहन सीता को लेकर पूर्वी पाकिस्तान से उजड़कर पश्चिम बंगाल आता है। उसके साथ कोई विरासत नहीं, केवल स्मृतियों का बोझ और भविष्य की एक थरथराती आशा है। इसी उजाड़ के बीच वह एक अनाथ दलित बालक, अभिराम, को अपने साथ ले लेता है। यह दृश्य मानो मनुष्यता की अंतिम चिंगारी है — जाति, धर्म और विभाजन से ऊपर उठती एक करुण सहानुभूति। परंतु घटक जानते हैं, इतिहास इतनी आसानी से मनुष्य को मुक्त नहीं करता। यह छोटा-सा परिवार, जो करुणा और सह-अस्तित्व की संभावनाओं से जन्म लेता है, धीरे-धीरे उसी समाज की अदृश्य दीवारों में कैद हो जाता है, जिससे भागकर वे यहाँ आए थे।
समय के साथ सीता और अभिराम का प्रेम विकसित होता है — यह प्रेम न तो विद्रोही है, न नाटकीय; यह बस दो अकेले, विस्थापित जीवनों का स्वाभाविक सहारा है। पर यहीं ईश्वर का चरित्र अपनी सबसे करुण विडंबना में खुलता है। स्वयं शरणार्थी, निर्धन, असुरक्षित — फिर भी अपने ब्राह्मणत्व के खोल से बाहर नहीं निकल पाता। उसकी चेतना में बसा जातिगत अहंकार उस मानवीय करुणा को निगल जाता है, जिसके कारण उसने कभी अभिराम को अपनाया था। विभाजन ने उसकी भूमि छीन ली, पर उसकी मानसिक संरचनाएँ अक्षुण्ण रहीं। यही इस फिल्म का सबसे गहरा आघात है — इतिहास बदलता है, पर मनुष्य की जड़ताएँ जस की तस रहती हैं।
सीता इस कथा की आत्मा है — मौन, धैर्यशील, और अंततः टूटी हुई। उसका जीवन केवल प्रेम-विछोह की कथा नहीं, स्त्री-अस्तित्व की उस त्रासदी का बिंब है जिसमें समाज की हर विफलता का बोझ अंततः स्त्री के शरीर पर आ गिरता है। जब परिस्थितियाँ उसे वेश्यावृत्ति की दहलीज़ तक पहुँचा देती हैं, तो यह व्यक्तिगत पतन नहीं, सामाजिक पराजय का क्षण है। और जब उसी अंधेरे कमरे में उसका सामना अपने भाई ईश्वर से होता है — वह भाई जो कभी उसका रक्षक था — तो दृश्य एक निजी दुर्घटना से उठकर सभ्यता के नैतिक दिवालियापन का उद्घाटन बन जाता है। यहाँ रामायण की ‘आदर्श’ सीता और आधुनिक यथार्थ की सीता के बीच की दूरी असहनीय रूप से उजागर होती है। समाज अब भी पवित्रता की माँग करता है, पर सुरक्षा नहीं देता; अग्निपरीक्षा चाहता है, पर आश्रय नहीं।
घटक का कैमरा यथार्थ को जस का तस दर्ज नहीं करता; वह उसे प्रतीकों की भाषा में रूपांतरित करता है। सुवर्णरेखा नदी यहाँ केवल नदी नहीं, समय की धारा है — बहती हुई, पर सब कुछ अपने भीतर सहेजती हुई। उजाड़ सैन्य शिविर, बंजर धरती, टूटे घर, दूर से आती अनाम ध्वनियाँ — ये सब मिलकर विस्थापन के उस सामूहिक अवचेतन को मूर्त करते हैं, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। ध्वनि, दृश्य, मौन — सब मिलकर एक ऐसी सिनेमाई कविता रचते हैं जहाँ कथा से अधिक वातावरण बोलता है, और संवाद से अधिक विराम।
“सुवर्णरेखा” हमें यह असहज सत्य दिखाती है कि विभाजन अतीत की घटना नहीं, वर्तमान की संरचना है। वह रेखा आज भी हमारे भीतर मौजूद है — जाति में, लिंग में, वर्ग में, स्मृतियों में। घटक की यह कृति एक प्रश्न की तरह हमारे सामने खड़ी रहती है: क्या हमने सचमुच कुछ सीखा? या हम अब भी अपने भीतर खिंची उन अदृश्य रेखाओं को ढोते हुए आगे बढ़ रहे हैं? यही कारण है कि यह फिल्म हर पीढ़ी के लिए नई हो जाती है — क्योंकि उसका घाव अभी भरा नहीं।
ऋत्विक घटक यहाँ निर्देशक नहीं, एक युग के करुण इतिहासकार बन जाते हैं। “सुवर्णरेखा” एक सिनेमाई अनुभव से आगे बढ़कर आत्मा का दर्पण है — जिसमें झाँकना आसान नहीं, पर आवश्यक है। यह फिल्म समाप्त नहीं होती; यह दर्शक के भीतर एक लंबी, धीमी प्रतिध्वनि बनकर जीवित रहती है — जैसे सुवर्णरेखा की धारा, जो बहती रहती है, भले ही उसके किनारे बार-बार उजड़ते रहें।
