रचना से उपजी नैतिकता पर आधारित पोस्ट-रिलिजियन सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना
सुधांशु के मिश्रा
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I. सैद्धांतिक परिकल्पना: क्या हो और कैसे हो
मनुष्य जब देवताओं, आत्माओं और परलोक की कल्पनाओं से मुक्त होता है, तो पहली दृष्टि में ऐसा लगता है कि नैतिकता का आधार भी ढह गया। सदियों तक यह माना गया कि बिना किसी पारलौकिक निगरानी के मनुष्य स्वार्थी, हिंसक और अराजक हो जाएगा। किंतु यह धारणा स्वयं एक ऐतिहासिक भ्रम है। वास्तव में नैतिकता का जन्म आकाश से नहीं, सह-अस्तित्व की अनिवार्यता से हुआ है।
जब अनेक व्यक्ति एक सीमित संसार में, सीमित संसाधनों और सीमित समय के साथ रहते हैं, तब उनके व्यवहार स्वतः कुछ सीमाओं की माँग करते हैं। ये सीमाएँ आदेश नहीं होतीं, बल्कि जीवन को चलायमान रखने की शर्तें होती हैं। यदि हर कोई केवल तत्काल लाभ को ही लक्ष्य बनाए, तो विश्वास टूटता है, सहयोग असंभव होता है, और अंततः वही लाभ भी नष्ट हो जाता है जिसकी चाह में नियम तोड़े गए थे।
यहीं से एक नई नैतिकता जन्म लेती है— न किसी धर्मग्रंथ से, न किसी अवतार से, बल्कि साझे जीवन की संरचनात्मक ज़रूरतों से।
नैतिकता उपदेश नहीं, व्यवहार की आदत है
इस व्यवस्था में नैतिकता कोई ऊँचे मंच से दिया गया भाषण नहीं है। वह रोज़मर्रा के व्यवहार में उतरती है। समय पर कतार में लगना; नियमों का पालन इसलिए नहीं कि वे “पवित्र” हैं, बल्कि इसलिए कि वे सबके लिए पूर्वानुमेयता पैदा करते हैं; वचन निभाना इसलिए नहीं कि झूठ पाप है, बल्कि इसलिए कि बिना भरोसे कोई व्यवस्था टिकती नहीं। यहाँ नैतिकता का माप भावना नहीं, परिणाम है। कोई आचरण तभी मूल्यवान है जब वह दीर्घकाल में सहयोग, स्थिरता और विश्वास को बढ़ाता है।
संस्थाएँ नैतिकता का असली माध्यम
इस व्यवस्था में नैतिकता पुस्तकों से नहीं फैलती, संस्थाओं से फैलती है। जब स्कूल यह दिखाते हैं कि निष्पक्षता से सभी को लाभ होता है; जब न्यायालय यह भरोसा देते हैं कि नियम व्यक्ति से बड़े हैं; जब कर प्रणाली यह अनुभव कराती है कि योगदान और सुविधा का रिश्ता वास्तविक है—तब नैतिकता लोगों के दिमाग में नहीं, उनकी आदतों में उतरती है।
लोग “अच्छे” इसलिए नहीं बनते कि उन्हें नैतिक उपदेश मिले, बल्कि इसलिए कि नियमों के पालन से जीवन सुगम होता है।
त्याग का नया अर्थ
यह व्यवस्था त्याग को पवित्र बलिदान नहीं मानती। वह उसे भविष्य के लिए किया गया विवेकपूर्ण निवेश मानती है। आज कुछ छोड़ना इसलिए नहीं कि कोई स्वर्ग मिलेगा, बल्कि इसलिए कि कल का जीवन अधिक स्थिर, अधिक सुरक्षित और अधिक सहयोगी होगा। यह त्याग भावुक नहीं, गणनात्मक है, पर निष्ठुर नहीं।
राजनीति: नैतिकता की प्रयोगशाला
इस ढाँचे में राजनीति किसी नैतिक आदर्श की घोषणा नहीं करती। वह ये प्रश्न पूछती है:
कौन-सी व्यवस्था सबसे कम टकराव पैदा करती है?
कौन-सा नियम सबसे अधिक भरोसा उत्पन्न करता है?
कौन-सी संस्था सबसे कम शक्ति-दुरुपयोग को संभव बनाती है?
राज्य यहाँ नैतिक उपदेशक नहीं, संरचनात्मक संतुलन का रक्षक है।
लोकप्रियता का रहस्य
ऐसी नैतिकता लोकप्रिय इसलिए नहीं होती कि वह भावुक है, बल्कि इसलिए कि वह काम करती है।
जब लोग अनुभव करते हैं कि— नियम टूटने से नुकसान होता है, सहयोग से जीवन आसान होता है; ईमानदारी से व्यवस्था मज़बूत होती है, तब नैतिकता कोई दार्शनिक विचार नहीं रहती, वह सामान्य समझ बन जाती है।
यह व्यवस्था किसी ईश्वर को नहीं बुलाती, फिर भी मनुष्य को अकेला नहीं छोड़ती। यह मोक्ष का वादा नहीं करती, फिर भी जीवन को अर्थहीन नहीं होने देती। यह कहती है कि नैतिकता आकाश से नहीं गिरती, वह साथ रहने की कीमत है। और जो समाज इस कीमत को समझ लेता है, वह उपदेश के बिना भी सभ्य हो सकता है।
संरचना की रक्षा के लिए नैतिक अवज्ञा का पाठ
संरचना-आधारित नैतिकता अंधी आज्ञाकारिता की माँग नहीं करती। वह नियमों को साध्य नहीं, साधन मानती है। इसलिए जब कोई नियम, संस्था या प्रक्रिया सहयोग, विश्वास और दीर्घकालिक स्थिरता के बजाय भय, असमानता और शक्ति- दुरुपयोग को बढ़ाने लगे, तब उसका यांत्रिक पालन नैतिक नहीं रह जाता। ऐसे क्षणों में नैतिक अवज्ञा व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह नहीं, बल्कि उसकी मरम्मत का प्रयास होती है। यह अवज्ञा भावनात्मक उग्रता से नहीं, संरचनात्मक विवेक से जन्म लेती है—जहाँ नियम-भंग इसलिए किया जाता है कि नियम का मूल उद्देश्य पुनः जीवित हो सके। यह न तो अराजकता को वैध ठहराती है, न ही निजी स्वार्थ को नैतिकता का मुखौटा देती है। नैतिक अवज्ञा तभी वैध है जब वह सार्वजनिक हो, तर्कसंगत हो, और अपने परिणामों की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार हो। इस अर्थ में वह नैतिकता की कमजोरी नहीं, उसकी आत्म-सुधार क्षमता है—एक ऐसा अंतर्निहित तंत्र जो यह सुनिश्चित करता है कि संरचना जीवित रहे, जड़ न बने, पक्षपाती न बने। कोई संरचना यदि स्थिरता तो दे, पर उसे पैदा करने की कीमत लगातार किसी एक समूह से वसूले, या शक्ति के केंद्र की तरफदारी और हाशिये की उपेक्षा करे, तो वह संरचनात्मक रूप से कार्यशील होते हुए भी अस्वीकार्य है।
शिक्षा का तकाजा है वह ऐसी नैतिकता, जो धर्मभीरु नहीं बल्कि उत्तरदायित्वपूर्ण हो, का निर्माण करे। बुद्धिवादियों का दायित्व है कि ऐसी नैतिकता का महत्व स्थापित करें। राजनीतिज्ञों का कर्तव्य है कि ऐसी व्यवस्था के विकास के लिए समुचित माहौल बनायें और न्यायमूर्तियों के निर्णय ऐसे हों जो ऐसी व्यवस्था की जड़ों को मजबूत करें।
II. भारतीय समाज में ऐसी नैतिकता का संकट
गहराई से देखें तो भारतीय समाज में नैतिकता का प्रश्न कभी केवल आचरण का प्रश्न नहीं रहा। वह हमेशा आस्था, भय, परंपरा और प्रतीकात्मक श्रेष्ठता से जुड़ा रहा है। यहाँ नैतिक होना अक्सर सही काम करने से अधिक, सही पक्ष में दिखने का नाम रहा है। परिणाम स्वरूप नैतिकता व्यवहार में नहीं, पहचान में बदल गई—और पहचान ने संस्थाओं को निगल लिया।
भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान की एक गहरी विशेषता यह है कि वह नियम को संदेह की दृष्टि से देखता है, लेकिन उपदेश को श्रद्धा से सुनता है। व्यक्ति नियम तोड़ते हुए अपराधबोध नहीं महसूस करता, पर नैतिक भाषा बोलते हुए आत्मसंतोष अनुभव करता है। यह विरोधाभास आकस्मिक नहीं है; यह सदियों से बनी एक ऐसी संस्कृति का परिणाम है जिसमें नैतिकता को संरचना नहीं, उपदेश माना गया।
धर्मप्रधान नैतिकता और व्यवहारिक ढीलापन
भारतीय समाज में नैतिकता का प्रमुख स्रोत पारलौकिक रहा है—कर्म, पुनर्जन्म, पुण्य, पाप। इन धारणाओं ने व्यक्ति को दीर्घकालिक अर्थ तो दिया, लेकिन तत्काल सामाजिक उत्तरदायित्व को कमजोर किया। जब न्याय इस जीवन में नहीं, किसी और जीवन में होना है, तो इस जीवन में नियमों के साथ गंभीर होना अनिवार्य नहीं रह जाता। यही कारण है कि यहाँ अन्याय से अधिक अपमान चुभता है, नियम टूटने से अधिक परंपरा टूटना खलता है, सार्वजनिक अव्यवस्था से अधिक नैतिक आरोप की चिंता होती है, नैतिकता यहाँ व्यवस्था को चलाने का उपकरण नहीं, बल्कि सत्ता, पहचान और श्रेष्ठता को वैध ठहराने का साधन बन गई।
संस्थाओं के प्रति अविश्वास: एक मनोवैज्ञानिक विरासत
औपनिवेशिक शासन, फिर स्वतंत्रता के बाद की राज्य-प्रणाली—दोनों ने भारतीय मन में यह गहरी धारणा बैठा दी कि संस्थाएँ पराई होती हैं। वे या तो शासक की हैं, या किसी वर्ग की। इसीलिए नियम का पालन नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि मूर्खता समझा जाने लगा।
जब संस्थाएँ विश्वसनीय नहीं होतीं, तब नैतिकता निजी हो जाती है—अपने परिवार के लिए, अपनी जाति के लिए, अपने समूह के लिए। पर सार्वजनिक जीवन नैतिक शून्य में चला जाता है।
मिर्डल का “सॉफ्ट स्टेट” और संरचनात्मक नैतिकता की विफलता
गुन्नार मिर्डल ने भारत जैसे समाजों को “Soft State” कहा था—ऐसा राज्य जहाँ कानून मौजूद तो होते हैं, पर लागू नहीं होते; जहाँ नीति घोषित तो होती है, पर उसका पालन वैकल्पिक बना रहता है; और जहाँ सार्वजनिक नैतिकता निजी समझौतों में घुल जाती है। यह “सॉफ्टनेस” नैतिक कमजोरी नहीं, बल्कि संरचनात्मक शिथिलता का परिणाम है। जब नियमों के उल्लंघन पर वास्तविक लागत नहीं आती, जब शक्ति के दुरुपयोग पर संस्थागत प्रतिक्रिया अनिश्चित रहती है, तब नैतिकता उपदेशों में सुरक्षित रहती है और व्यवहार से पलायन कर जाती है। मिर्डल का सॉफ्ट स्टेट इस लेख की केंद्रीय परिकल्पना को उलटता नहीं, बल्कि पुष्ट करता है—कि बिना कठोर, निष्पक्ष और पूर्वानुमेय संरचनाओं के कोई भी नैतिकता, चाहे वह धार्मिक हो या पोस्ट-रिलिजियन, टिक नहीं सकती। ऐसे राज्य में नैतिकता भावना बन जाती है, आदत नहीं; पहचान बन जाती है, प्रक्रिया नहीं।
परिणामस्वरूप लोग व्यवस्था से नैतिक अपेक्षा करना छोड़ देते हैं और नैतिकता को या तो निजी क्षेत्र में सीमित कर लेते हैं या सत्ता-संरक्षण के औज़ार में बदल देते हैं। मिर्डल का सॉफ्ट स्टेट इसीलिए किसी सांस्कृतिक दोष का नहीं, बल्कि उस विफल संरचना का निदान है जो नैतिकता को काम करने योग्य बनने से पहले ही निष्क्रिय कर देती है।
भारत में पोस्ट-रिलिजियन नैतिकता क्यों कठिन है?
पोस्ट-रिलिजियन नैतिकता कहती है: “नियम मानो क्योंकि वे काम करते हैं।” जबकि भारतीय मन कहता है: “नियम मानो अगर वे तुम्हारे हों।” यह अंतर निर्णायक है।
भारतीय समाज में नैतिकता तब तक लोकप्रिय होती रही है जब तक वह पहचान को पुष्ट करे, आत्मगौरव दे, दोष किसी और पर डालने में सहायक हो। पर वह नैतिकता जो कहे कि “तुम्हारा छोटा सा अनुशासन पूरे तंत्र को स्थिर करता है”— यह बात यहाँ सहज नहीं उतरती।
फिर भी, क्या कोई संभावना है? हाँ—पर शर्तों के साथ। भारतीय समाज में नैतिकता तर्क से नहीं,
अनुभव से बदलती है। जब लोग प्रत्यक्ष देखते हैं कि कतार में लगने से सेवा तेज़ होती है, नियम पालन से उत्पीड़न घटता है, पारदर्शिता से शक्ति सीमित होती है, तब धीरे-धीरे नैतिकता उपदेश से हटकर आदत बनती है।
इस देश में नैतिकता का सुधार भाषणों से नहीं होगा, बल्कि छोटे, कठोर, निष्पक्ष नियमों से होगा जो बिना भेदभाव लागू हों।
भावनाओं की भूमिका: न त्याग, न उपहास
भारतीय समाज को भावनाओं से काटा नहीं जा सकता। लेकिन भावनाओं को नैतिकता का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। यहाँ समाधान यह नहीं कि करुणा, त्याग, सेवा को नकार दिया जाए— बल्कि यह कि उन्हें व्यवस्था का विकल्प न बनने दिया जाए। भावना प्रेरणा हो सकती है, पर व्यवस्था का स्थान नहीं ले सकती। यह एक कठिन, पर आवश्यक रूपांतरण भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान में नैतिकता को स्वर्ग से उतारकर सड़क, दफ़्तर, स्कूल और न्यायालय में रखना, एक सांस्कृतिक झटका होगा।
पर यही झटका आवश्यक है। क्योंकि जिस समाज में नैतिकता केवल बोली जाती हो, और व्यवहार में स्थगित रहती हो, वह समाज अंततः या तो पाखंडी बनता है या अराजक। नयी नैतिकता का सार यह नहीं कि लोग “अच्छे” बनें, बल्कि यह है कि साथ रहना संभव बना रहे। और भारतीय समाज के लिए, आज यह किसी भी मोक्ष-वचन से अधिक आवश्यक है। सुधांशु के मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार
