अपमान ही सच्ची आजीविका

व्यंग्य

 

अपमान ही सच्ची आजीविक

 

अरुण देव

 

नौकरी करने, परिवार में रहने और प्रेम करने में अपमान होता ही है. दरअसल पूरे जीवन से ही अपमान का संबंध है. अपमान ही सच्ची आजीविका है. बिना अपमान के आप समाज में जीवित नहीं रह सकते. आप अपमान सहते हैं, इसके बदले ही आपको जीवन जीने का अवसर मिलता है. दिनचर्या में मौक़ा आने पर आप भी अपमान करते हैं. इससे अपमान रूपी जीवन या जीवन रूपी अपमान का एक चक्र पूरा होता है. अपमान करना, सहना, एक विद्या है. इसे सीखकर या बिना सीखे भी जीना पड़ता है. फ़र्क़ यह है कि जो इस विद्या को जान लेता है तो वह कुछ संतोष के साथ मर सकता है. लेकिन मरते समय हर एक आदमी को लगता यही है कि उसने अपमान किया कम, सहा ज्यादा.

बहरहाल, यह सब सोचते हुए, जानते हुए भी मैंने बॉस से कहा-

‘‘सर, मैं यहाँ काम करने आता हूँ, गाली खाने नहीं. काम करूँगा लेकिन अपमान नहीं सहूँगा.’’

प्रेमिल उत्तर मिला-

‘‘अपमान कार्य-संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा है.’’

बॉस स्पष्टवादिता के लिए प्रशिक्षित हैं. जबसे नौकरी की सुरक्षा ख़त्म हो गई है, उन्हें और अधिक स्पष्टवादी होने का निर्देश और साहस बाक़ायदा परिपत्र भेजकर दिया गया है.

मैंने इस बारे में घर से बाहर अपने आत्मीय दोस्त और घर में पत्नी से में बात की. दोस्त ने हँसते हुए बताया कि अपमान के भरोसे ही उसका जीवन कट रहा है. यह कोई चिंताजनक बात नहीं है. पत्नी ने कहा कि बरसों से वह अपमान के बदले ही रोटी-कपड़ा-मकान और बिस्तर की सुविधा ले रही है.

लेकिन मेरी तृष्णा और व्यग्रता शांत नहीं हुई. इसलिए शाम को दूसरे मोहल्ले में रह रहे पिता के पास जाकर बैठा. घुमा-फिराकर यह घटना बताई और अपमान-सिद्धांत पर अपनी बात रखी. उन्होंने पिता की तरह अक्खड़ और खड़ा जवाब दिया-

‘‘इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं. यदि अपमान नहीं सह सकते तो रोटी नहीं खा सकते. यह मानव-सभ्यता का इतिहास है. यही मनुष्य की जैविकता का रहस्य है. तुम हर महीने मुझे बारह हज़ार रुपये देते हो. यानी मैं चार सौ रुपये रोज़ के हिसाब से अपमान की ख़ुराक पर जीवित हूँ. तुम मेरे पास आते हो और नियमित बदतमीज़ी करते हो. और जिस दिन नहीं आते हो तो सिर्फ़ यह बताने के लिए कि उतनी ही राशि में, ज़्यादा अपमानित भी किया जा सकता है.’’

गहरी साँस लेकर फिर बोले-

‘‘तुम ध्यान दोगे तो देखोगे कि मनुष्यों के संसार की हर क्रिया में अपमान की क्रिया शामिल है. घरों में, गलियों में, चौराहों पर, सभाओं में, सदनों में टेलिविज़न पर, सिनेमा में, भाषणों में, किताबों में, उपदेशों में उन सबके लिए अपमान भरा पड़ा है जो स्वतंत्रताकामी और न्यायपूर्ण जीवन चाहते हैं. मनुष्य होने की इच्छा मात्र से अपमान की पात्रता हो जाती है. तुम मुझे एक भी महत्वपूर्ण क्रिया, कोई ऐसा सक्रिय महान वाक्य निकालकर दिखाओ जिससे किसी का अपमान न होता हो. न्याय में, हँसी में, पुरस्कार में, प्रशंसा में, प्रेम में. हर ऐसे शब्द में यदि एक के लिए सम्मान है तो उसीमें दूसरे का अपमान छिपा हुआ है. बल्कि उजागर है. चमकता हुआ.’’

मैं सोच में पड़ गया. लज्जित भी हुआ होऊँ शायद.

उन्होंने आख़िर बात समाप्त करते हुए कहा –

‘‘जो अधिक अपमान कर सकता है, उससे उसकी ताक़त का पता चलता है. मेरा अनुभव है कि बीमार बुढ़ापा सर्वाधिक निर्बल होता है इसलिए सर्वाधिक अपमान सहता है. हर कोई इसलिए भी शक्तिशाली होना चाहता है ताकि वह कम अपमान सहे और ज़्यादा अपमान कर सके. परिवार मे, जीवन में या समाज में सत्ता पाने की कोशिश दरअसल व्यवस्थित, आधिकारिक और कानून-सम्मत अपमान कर सकने की आकांक्षा है. सारा धर्म, विज्ञान और राजनीति इसीमें जुटे हैं कि कम से कम व्यय में, अधिकतम लोगों का, अधिकतम अपमान, अधिकतम आसानी से किया जा सके. और अपमान करने, सहने को इतना नैतिक बनाया जा सके कि किसी को अपराध-बोध न हो. आगे नयी विधियों के साथ अपमान होगा. तकनीक भी मनुष्य को तरह-तरह से अपमानित करेगी. मानव-सभ्यता का यही भविष्य है.’’

पिता से बात करके मेरी जिज्ञासा काफी हद तक शांत हो गई. सच ही कहा है कि बुज़ुर्गों के पास पर्याप्त अनुभव और व्यावहारिक ज्ञान होता है. अपमान का भी. अब मैं अधिक इत्मीनान से नौकरी कर पा रहा हूँ. बॉस से झगड़ा ख़त्म हो गया है. मेरे आधिपत्य में काम करनेवाले कर्मचारी भी अब एकदम सतर्कता से काम करते हैं. वे जान चुके हैं कि अब मैं भी निडर होकर, पर्याप्त अपमान कर सकता हूँ. कंपनी की उत्पादन क्षमता के लिए मेरी गिनती उपयोगी लोगों में होने लगी है. नौकरी से निकाले जाने का ख़तरा पूरी तरह तो नहीं लेकिन काफी कुछ ख़त्म हो गया है. पत्नी, बच्चे भी मज़े में जी रहे हैं. मैं समझ गया हूँ कि कई बार चीज़ों के हल बहुत आसान होते हैं. हम व्यर्थ ही उन्हें जटिल बनाते हैं.

फिर उन्होंने एक बोधकथा की तरह कुछ सुनाया.

शायद मुझे चिढ़ाने के लिए.

”देखो, मनुष्य का आयुष्य हाथी के बराबर होता है. पूरे सौ वर्ष. पूर्ण स्वस्थ सौ साल. इसलिए शतायु होने का आशीर्वाद दिया जाता है. लेकिन जानते हो आदमी पिछले लंबे समय से सौ बरस का जीवन नहीं जी सका है. अपवाद छोड़ दो लेकिन यह एक साधारण नियम हो गया है कि कोई शतायु नहीं हो पाएगा. कितना भी आशीर्वाद दो लेकिन वह सौ के पहले ही चला जाएगा. क्यों? वह इसलिए कि आदमी को समाज और उसके परिजन मार डालते हैं. कैसे? अरे भाई, अपमान करके.

अनवरत अपमान करके.। अरुणदेव के फेसबुक वॉल से साभार

यदि कम से कम परिजन ही उसका अपमान न करें तो वह स्वस्थ रूप से नब्बे के ऊपर तक निश्चित ही जीवित रह सकेगा. लगातार अपमान से ‘मल्टी ऑरगन फेल्युर’ हो जाता है. यही कारण है कि अब कोई किसी को शतायु होने का आशीर्वाद या शुभकामना देता है तो उसे वह वरदान नहीं, अभिशाप समझता है. फिर मुझे किंकर्त्तव्यविमूढ़ या उजबक की तरह खड़ा देखकर उन्होंने कहा- अब तुम जाओ.

पिछले महीने मेरी पदोन्नति हुई और आकर्षक वेतनवृद्धि मिली.

मैं बहुत ख़ुश था. ख़ुशी में मैंने पिता को बताया कि अब मैं आपको अठारह हज़ार रुपये हर महीने दे सकता हूँ. पिता ने मेरी तरफ़ कुछ अजीब ढंग से देखा। अरुण देव के फेसबुक वॉल से साभार 

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