सोहनपाल चौहानः 80 की उम्र में भी सक्रियता बरकरार

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग -74

सोहनपाल चौहानः 80 की उम्र में भी सक्रियता बरकरार

 

सत्यपाल सिवाच

अगर जीवन को देखने और परखने का नजरिया मानवीय हो तो व्यक्ति के लिए उम्र कोई मायने नहीं रखती। यही बात सोहनपाल चौहान पर भी लागू होती है। वे भले ही अस्सी साल के हो गए हैं लेकिन जनता से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं और हरियाणा के तमाम नेताओं की तरह किसान सभा के जरिये सेवा भाव में जुटे हुए हैं।

फरीदाबाद जिले के गांव अटोहां (अब पलवल) में 1945 में श्रीमती परसादी और श्री भिक्खन राम के घर जन्मे सोहनपाल हरियाणा में बिजली कर्मचारियों के आन्दोलन से नेता के रूप में उभरे। सन् 1986-87 में सर्वकर्मचारी संघ के गठन करने वाले सैकड़ों कार्यकर्ताओं में वे अग्रणी पंक्ति में थे। सोहनपाल के माता-पिता किसान थे। उनके पिता जी गांव के सरपंच भी रहे थे। इस तरह उन्हें नेतृत्वकारी गुण अपने परिवेश में ही मिल गए थे। उनका परिवार साधारण किसान होते हुए भी राजनीतिक रूप से जागरूक रहा है। वे चार भाई और एक बहन हैं।

सोहनपाल ने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की और 1970 में बिजली बोर्ड में ए.एल.एम. के रूप में नौकरी करने लगे। सन् 1995 में वे पदोन्नत होकर लाइन मैन बन गए और सन् 2003 में इसी पद से सेवानिवृत्त हो गए। जिन दिनों वे नौकरी में आए उन दिनों चौधरी बंसीलाल के तानाशाही शासन के खिलाफ कर्मचारियों में भय भी था और आन्दोलन करने की सुगबुगाहट भी। सन् 1972 में कॉलेज टीचर्स ने हड़ताल की; 1973 में स्कूल टीचर्स ने और उसके कुछ महीने बाद बिजली कर्मचारियों ने। सोहनपाल अपने बचपन से गरीबों के प्रति हमदर्दी और लूट के प्रति नफरत के विचार रखते थे। इसलिए वे बिजली कर्मचारियों की हड़ताल में शामिल हो गए। अगले ही साल फिर बिजली कर्मचारियों की हड़ताल हुई। सभी कर्मचारियों की तालमेल कमेटी भी बनी। सोहनपाल को निलंबित करके जेल भेज दिया गया। लगभग महीने बाद रिहा हुए। एक तरह यह उनकी सीधी लड़ाई की ट्रेनिंग थी।

सोहनपाल 1976 में यूनियन के पदाधिकारी बन गए। सन् 1981 में यूनियन में बढ़ते व्यक्तिवाद के खिलाफ बगावत हो गई। प्रेमसागर शर्मा, बनवारीलाल बिश्नोई, जयपाल, बाबू अमरनाथ, सोहनपाल, रामगोविंद हुड्डा, भूपसिंह बेनीवाल, यादराम, आर.सी. जग्गा समेत अनेक नेता-कार्यकर्ताओं ने संगठन को बचाने के लिए हेड ऑफिस हिसार नाम से यूनियन के जनवादीकरण के लिए संघर्ष किया। पहले से स्थापित प्यारेलाल जैसे दिग्गज नेताओं को चुनौती देना आसान न था, लेकिन ये लोग सही लक्ष्य और सटीक रणनीति बनाकर काम करते करते कर्मचारियों में पैठ बनाते गए। यह प्रक्रिया अध्यापकों, रोडवेज, चतुर्थ श्रेणी आदि और भी संगठनों में चल रही थी। एक ओर विभाजित आन्दोलन से निराशा थी तो दूसरी ओर कुछ प्राप्त करने की आकांक्षा।

इसी के चलते कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के समर्थन के लिए की गई एकजुटता कार्यवाही अन्ततः सर्वकर्मचारी संघ के गठन तक पहुंची, जिसका महत्वपूर्ण किरदार सोहनपाल भी रहे। सोहनपाल उस समय बिजली यूनियन के अध्यक्ष थे। वे बाद में 1991 में सर्वकर्मचारी संघ की केन्द्रीय कमेटी में सदस्य भी चुने गए। जब 5 अप्रैल 1987 को बनवारीलाल को आमरण अनशन करने के दौरान गिरफ्तार कर लिया तो आन्दोलन के दौरान सोहनपाल एक्शन कमेटी का हिस्सा रहे और सरकार से हुई 13 मई 1987 की वार्ता कमेटी में भी शामिल थे। वे अपनी सेवानिवृत्ति तक बिजली यूनियन और सर्वकर्मचारी संघ में सक्रिय रहे। रिटायरमेंट के बाद पलवल इलाके में किसान सभा में काम किया। रिटायर्ड कर्मचारी संघ में भाग लेते रहते हैं। 2020-21 के आन्दोलन में पलवल में मोर्चा लगाने में सक्रिय भूमिका रही। वे बहुत पहले वामपंथी विचार और संगठन के साथ जुड़ गए थे और इसी वजह से मेहनतकश जनता दूसरे तबकों को संगठित करने में रुचि लेते हैं।

आन्दोलन में परिवार का रुख ठीक रहा। वे सहयोग ही करते थे। संगठन में काम करते हुए कांग्रेस के गयालाल, उदयभान, कर्णसिंह दलाल, रामजीलाल डागर, इनेलो नेता खिल्लन सिंह आदि से संपर्क रहे। उन्होंने किसी नेता से कभी कोई निजी काम नहीं लिया। पहले और अब के हालात पर टिप्पणी करते हुए वे बताते हैं कि उस समय यूनियन के लोग भी ज्यादा काम करते थे और कर्मचारियों का सहयोग भी अधिक मिलता था। वे अपने समय के प्रसंग सुनाते हुए कहते हैं कि केन्द्र में बिजली विधेयक प्रस्तावित था। ई. बालानंदन सीटू नेता थे। बिजली कर्मचारियों को लेकर वे राष्ट्रपति के. आर. नारायणन से मिले और बिल की खामियां बताईं तो वह रोक लिया गया। मई 1987 में कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के हस्तक्षेप से हरीश रावत व पी.आर. कुमारमंगलम की ड्यूटी लगाई गई, लेकिन मुख्यमंत्री ने उन्हें तरजीह नहीं दी। वे इस बीच वरिष्ठ मंत्री शमशेर सिंह सूरजेवाला की अध्यक्षता में कमेटी गठित कर चुके थे। केन्द्रीय नेताओं से मिलने वाले डेलिगेशन में सोहनपाल भी शामिल थे।

सोहनपाल का विवाह 1963 में हो गया था। उनके बड़े बेटों का भी देहांत हो चुका है। पोता बी.टेक. कर रहा है। छोटा बेटा दुकान करता है। वे इस समय सपरिवार पलवल में रहते हैं। सौजन्यः ओमसिंह अशफ़ाक

लेखक- सत्यपाल सिवाच

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