हरियाणाः जूझते जुझारू लोग- 73
सुलझे व समर्पित नेता और शिक्षक : मोतीराम
सत्यपाल सिवाच
मोतीराम को मैं सक्रिय होने के शुरुआती समय से जानता हूँ। वे उन आदर्श शिक्षकों में गिने जाते रहे हैं जो अध्यापन को अपना पहला काम मानते रहे हैं। वे अध्यापन को छात्रों और समाज के प्रति जवाबदेही समझते रहे। यूनियन में यही उनके मूल्य रहे। 4 अगस्त 1950 को तत्कालीन महेन्द्रगढ़ जिले (अब दादरी) के इमलोटा गांव में श्रीमती छोटी देवी और श्री बख्तावर सिंह के यहाँ एक सपूत का जन्म हुआ। मां-बाप ने उसको मोतीराम नाम दिया। साधारण किसान परिवार में जन्म लेकर वे गांव के दायरे से बाहर हरियाणा के शिक्षक आन्दोलन के लोकप्रिय नेताओं में शुमार हुए। वे एक बहन और तीन भाई हैं। मोतीराम ने बी.एससी. बी.एड. और एम.ए. (राजनीति शास्त्र) तक शिक्षा प्राप्त की।
पहले वे 4 फरवरी 1972 को बिना बी.एड. किए गणित अध्यापक नियुक्त हो गए थे। बी.एड. करने उपरांत 28 अक्तूबर 1974 को अस्थायी आधार पर विज्ञान अध्यापक नियुक्त हुए। उन्हें नियमित होने तक 15 बार किसी न किसी कारण स्कूल बदलना पड़ा। आखिर 01 जनवरी 1980 को दो साल की सेवा के आधार वे नियमित हुए। वे 31 अगस्त 2008 को विज्ञान अध्यापक पद से ही सेवानिवृत्त हो गए।
सन् 1973 की सफल हड़ताल के बाद जब सरकार ने शिक्षक नेताओं को उत्पीड़ित करना शुरू किया तो वे मोतीराम संगठन की ओर आकर्षित हुए। उन्हें हड़ताल के बाद हटा दिया गया था। बाद में कच्चे अध्यापकों को स्टाइपेंडरी बना दिया गया, लेकिन अप्रशिक्षित होने के कारण वे वंचित रहे। बार बार रोजगार कार्यालय के चक्कर काटने पड़ते। वहाँ भ्रष्टाचार इस कदर था कि अस्थायी शिक्षक मन ही मन व्यवस्था को कोसते। जनवरी 1980 से सेवाएं नियमित होने के बाद उन्हें राहत मिली। मोतीराम जी को अध्यापकों में कर्तव्य के लापरवाही भी बहुत खलती थी। यूनियन के नेता पढ़ाते थे, यही उन्हें अच्छा लगता। इसी से प्रभावित होकर वे रेग्युलर होने के बाद यूनियन की गतिविधियों में भाग लेने लगे।
सन् 1992 से 1998 तक दादरी-1 खण्ड में यूनियन के सचिव व प्रधान रहे। 1998 से 2000 तक जिला भिवानी के ऑडिटर रहे और 2000-2006 तक तीन बार जिला सचिव रहे। सन् 2006 में राज्य ऑडिटर बने। वे 1998 से 2000 के सत्र में सर्व कर्मचारी संघ दादरी के सचिव भी रहे। नौकरी पक्की होने के बाद वे स्थानीय गतिविधियों में भाग लेने लगे थे। पुलिस के साथ भिड़ंत में उन्हें कई बार पानी की बौछारों को सहना पड़ा, लाठियां खानी पड़ीं और पुलिस हिरासत में रहना पड़ा। उन्हें और सतबीर सिंह तक्षक को अन्य साथियों के साथ 24 नवंबर 1993 से 30 नवंबर 1993 तक चण्डीगढ़ की बुड़ैल जेल में रखा गया। उन्हें चण्डीगढ़ जाने के लिए भिवानी से एकता एक्सप्रेस को पकड़ना था। बसों में भी धरपकड़ की सूचना मिली तो उन्होंने पुलिस से आँख बचाकर सांजरवास से चण्डीगढ़ की बस पकड़ी। सन् 1997 के आन्दोलन में 13 फरवरी 1997 को उन्हें सुबह बस स्टैंड दादरी पहुंचना था। वे अनेक साथियों के साथ बस अड्डे पर जमा हो गए और 15 साथियों सहित गिरफ्तार कर लिए गए। अनेक यातनाएं देकर दो दिन बाद जमानत मिल पाई। मुकदमा चलता रहा जो 11 अगस्त 1997 को खारिज हुआ। सर्वकर्मचारी संघ के आन्दोलनों से आम कर्मचारियों में हौसला आ गया था। सभी को भरोसा था कि सरकार को उनकी बात सुननी ही पड़ेगी।
मोतीराम को सेवाकाल के अंतिम दौर में बोलने में कठिनाई होती थी। डॉक्टरों ने उन्हें कम बोलने की सलाह दे रखी है। इसलिए वे सेवानिवृत्ति के बाद बहुत सक्रिय योगदान नहीं दे पाए। उनका मानना है कि शिक्षकों और कर्मचारियों को जनता की सेवा पूरी ईमानदारी से करनी चाहिए। यूनियन तभी मजबूत होती है जब उसे आम जनता में हमदर्दी का माहौल मिलता है। यद्यपि चौधरी बंसीलाल और भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के परिवारों में उनकी दूर की रिश्तेदारी है लेकिन उन्होंने यूनियन के साथ सम्बन्धों को ही प्राथमिकता दी। जिले के शिक्षा अधिकारियों के अलावा उनका देवेन्द्र सिंह आईएएस के साथ भी परिचय रहा, किन्तु कभी निज हित में सम्बन्धों का इस्तेमाल नहीं किया। आज के कार्यकर्ताओं से वे उम्मीद करते हैं कि वे अधिक काम कर सकते हैं। जो काम पूरा करने में पहले कई दिन लगते थे, वह पल भर में पूरा हो सकते है। संगठन के बिना ईमानदारी से नौकरी करना भी संभव नहीं है।
मोतीराम जी का बाल विवाह हुआ था। सन् 1958 में जब वे दूसरी कक्षा में थे तभी उनका विवाह सुश्री चन्द्रकला के साथ कर दिया गया। उनके तीन पुत्र हैं। प्रदीप सिंह बिजली निगम में अकाऊंटेंट हैं, दूसरा प्रमोद सांख्यिकी विभाग में पंचकूला में ए.आर.ओ. हैं और तीसरा अमित एयरफोर्स में सार्जेंट है। तीनों पुत्रवधुएं पोस्ट ग्रेजुएट हैं। वे नौकरी में नहीं हैं। मोतीराम जी आज भी उन्हीं सामाजिक आदर्शों को मानते हैं जिनके साथ उन्होंने अपना समय बिताया है। वे अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठित व्यक्ति माने जाते हैं। (सौजन्य ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक- सत्यपाल सिवाच
