बात बेबात
स्लाइड्स नहीं, शब्द कुचले जा रहे थे
- अब वही लेखक बुलाए जाएंगे जो “कम बोलें, ज़्यादा मुस्कुराएं”
- साहित्यिक आयोजन कम और प्रशासनिक स्टैंड-अप कॉमेडी ज़्यादा
विजय शंकर पांडेय
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक परिसंवाद अचानक “राष्ट्रीय मौन साधना शिविर” में तब्दील हो गया, जब मंच पर बैठे वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा को यह कहकर बाहर जाने का निर्देश दे दिया गया कि “आप बहुत ज़्यादा साहित्यिक हो रहे हैं।” साहित्यिक परिसंवाद में साहित्य का ज़्यादा होना आजकल एक गंभीर अपराध माना जाता है, खासकर तब जब कुलपति मंच पर मौजूद हों और साहित्य अपनी सीमा लांघकर विचार बन जाए।
कुलपति महोदय का मानना था कि परिसंवाद में केवल वही बातें होनी चाहिए जो पहले से स्वीकृत हों, मुद्रित हों, और अगर संभव हो तो कुलपति कार्यालय से पास होकर आई हों। मनोज रूपड़ा जैसे कथाकारों की समस्या यही है कि वे कहानी के साथ सवाल भी ले आते हैं। और सवाल विश्वविद्यालयों में उतने ही असहज होते हैं, जितने हॉस्टल के खाने में स्वाद।
घटना के बाद साहित्यिक जगत में भूचाल आ गया। लेखक, कवि, आलोचक—सबने अपनी-अपनी कलमें निकाल लीं। कुछ ने फेसबुक पर लंबी पोस्ट लिखी, कुछ ने व्हाट्सऐप स्टेटस लगाया और कुछ ने तो बाकायदा कविता भी रच दी—हालांकि कविता पढ़ने वाला कोई नहीं मिला। कुलपति समर्थक खेमे ने सफाई दी कि कथाकार को बाहर नहीं निकाला गया, बल्कि “स्वतंत्र विचार-विमर्श के लिए मुक्त वातावरण” प्रदान किया गया था—मंच से बाहर।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह साहित्यिक परिसंवाद था, कोई साहित्यिक विद्रोह नहीं। यहां कथा हो सकती है, लेकिन कटाक्ष नहीं। व्यंग्य हो सकता है, लेकिन व्यवस्था पर नहीं। आलोचना हो सकती है, लेकिन इतनी नहीं कि कुर्सी डोलने लगे। कुलपति की कुर्सी वैसे भी बहुत संवेदनशील मानी जाती है—ज़रा-सी वैचारिक ठंड लगते ही हिलने लगती है।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि विश्वविद्यालय अब ज्ञान के नहीं, “अनुशासन के मंदिर” हैं। यहां सरस्वती तो विराजमान हैं, लेकिन वीणा बजाने से पहले अनुमति पत्र ज़रूरी है। लेखक को मंच मिलेगा, बशर्ते वह लिखे कम, पढ़े ज़्यादा और सवाल बिल्कुल न पूछे। अगर पूछ ही ले, तो उसे “अकादमिक असुविधा” का दोषी मान लिया जाता है।
साहित्यिक गरिमा की बात करते हुए कई विद्वानों ने कहा कि यह केवल एक कथाकार का अपमान नहीं, बल्कि पूरी साहित्यिक चेतना का अपमान है। हालांकि विश्वविद्यालय की ओर से आश्वासन दिया गया है कि अगली बार परिसंवाद में केवल वही लेखक बुलाए जाएंगे जो “कम बोलें, ज़्यादा मुस्कुराएं” और जिनकी रचनाएं किसी भी स्थिति में कुलपति को असहज न करें।
अंततः यह साफ हो गया कि आज के साहित्यिक परिसंवादों में सबसे सुरक्षित विधा मौन है। जो लेखक चुप रहता है, वही महान है। जो सवाल करता है, वही विवाद है। और जो विवाद से डरता है, वही विश्वविद्यालय प्रशासन का प्रिय साहित्यकार है।
मनोज रूपड़ा मंच से उतरे, लेकिन सवाल मंच पर ही रह गए। और विश्वविद्यालय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहां विचारों की स्वतंत्रता पूरी तरह सुरक्षित है—जब तक वह बाहर ही रहे।

सच पूछिए तो गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में जो हुआ, वह साहित्यिक आयोजन कम और प्रशासनिक स्टैंड-अप कॉमेडी ज़्यादा लग रहा था। मंच पर मशहूर कथाकार मनोज रूपड़ा थे और सामने विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर—जो शायद समझ बैठे थे कि साहित्यिक संवाद नहीं, पावर पॉइंट प्रजेंटेशन चल रहा है। फर्क बस इतना था कि स्लाइड्स नहीं, शब्द कुचले जा रहे थे।
सबसे दिलचस्प दृश्य था—आसपास बैठे साहित्यकार। वे वही लोग थे जो कहानी में सत्ता से टकराते हैं, कविता में क्रांति रचते हैं और लेख में व्यवस्था को नंगा कर देते हैं। लेकिन जैसे ही असली सत्ता सामने आई, सब अचानक मौन साहित्य के अनुयायी बन गए। होंठ ऐसे सिले थे मानो किसी ने “आपातकाल संस्करण” की ज़िप लगा दी हो।
लेखक शायद सोच रहे थे—“यह अपमान अभी हो रहा है, इस पर प्रतिक्रिया अभी दें या बाद में किसी गोष्ठी में ‘संवेदनशील विमर्श’ करें?” किसी को डर था कि बोल दिए तो अगला निमंत्रण रद्द हो जाएगा, किसी को चिंता थी कि फेसबुक पोस्ट के लिए फोटो खराब न हो जाए।
और वीसी साहब? वे साबित कर रहे थे कि ऊँचे पद पर बैठने से स्तर ऊँचा हो ही जाए, ज़रूरी नहीं। कुर्सी बड़ी थी, मगर व्यवहार इतना छोटा कि शब्द भी झेंप जाएँ।
आख़िर में सवाल वही रह गया—लेखक लड़ क्यों नहीं सकता? शायद इसलिए कि लड़ना जीवन में जोखिम है और लिखना… सुरक्षित स्मृति!

लेखक – विजय शंकर पांडेय
