नहीं रहे वयोवृद्ध कहानीकार – संपादक ज्ञानरंजन

स्मृतिशेष (21 नवंबर 1936- 07 जनवरी 2026)

नहीं रहे वयोवृद्ध कहानीकार – संपादक ज्ञानरंजन

बहुत दुखद सूचना आ रही है। श्रेष्ठ कहानीकार और सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक संपादकों में से एक पहल पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन जी का सात जनवरी 2026 की रात में 10.30 बजे निधन हो गया है। बताया जा रहा है कि तबीयत खराब होने पर उन्हें बुधवार की सुबह जबलपुर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया और देर रात उनका देहावसान हो गया। वह 90 साल के थे। घंटा, बहिर्गमन  ज्ञानरंजन जी का जाना हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके जैसा संपादक और कहानीकार होना बहुत ही मुश्किल है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवम्बर, 1936 को महाराष्ट्र के अकोला ज़ि‍ले में हुआ। प्रारम्भिक जीवन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में व्यतीत हुआ। उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। जबलपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध जी. एस. कॉलेज जबलपुर में हिन्दी के प्रोफ़ेसर रहे और 34 साल की सेवा के बाद 1996 में रिटायर हुए।

ज्ञानरंजन सातवें दशक के प्रमुख कथाकार थे। तीन पुस्तकें प्रकाशित। कबाड़खाना (1996), सपना नहीं (1997) और उपस्थिति का अर्थ (2020)। अनूठी गद्य रचनाओं की एक क़िताब कबाड़खाना बहुत लोकप्रिय हुई। उनकी घंटा, बहिर्गमन समेत कई कहानियां काफी चर्चित रहीं। उनकी कहानी प्रकाशित होते  ही चर्चा में आ जाती। देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में उच्चतर पाठ्यक्रमों में उनकी कहानियां पढ़ाई जाती हैं। उनकी कहानियां अंग्रेज़ी, पोल, रूसी, जापानी, फ़ारसी और जर्मन भाषाओं में प्रकाशित हुई हैं।

उनको जितनी प्रसिद्धि कहानीकार के रूप में मिली उससे अधिक पहल के संपादक के रूप में। पहल का संपादन प्रकाशन निरंतर 35 वर्ष तक किया। उसका प्रकाशन आपातकाल में भी जारी रहा। एक बार स्थगित हुई तो 2 वर्ष के अन्तराल के बाद पुनः प्रकाशित होने लगी।

उनको सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’, हिन्दी संस्थान का ‘साहित्य भूषण सम्मान’, म.प्र. साहित्य परिषद का ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ और ‘अनिल कुमार पुरस्कार’, मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग का ‘शिखर सम्मान’ और ‘मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का ‘प्रतिभा सम्मान’, ‘शमशेर सम्मान’ और पाखी का ‘शिखर सम्मान’, भारतीय ज्ञानपीठ का अखिल भारतीय ‘ज्ञानगरिमा मानद अलंकरण’, अमर उजाला का ‘शब्द सम्मान’ आदि मिला।

उन्होंने आपातकाल के प्रतिरोध में मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग का एक पुरस्कार और मुक्तिबोध फ़ेलोशिप को अस्वीकार कर दिया था।

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के ज्वलंत वर्षों में लम्बे समय तक उसके महासचिव रहे। हरिशंकर परसाई के साथ राष्ट्रीय नाट्य संस्था ‘विवेचना’ के संस्थापक सदस्य भी रहे।

ज्ञानरंजन जी को प्रतिबिम्ब मीडिया परिवार की तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि।

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