हरियाणाः जूझते जुझारू लोग- 70
आजाद सिंह सिवाच- भरोसे और आत्मीयता से बनाई खास पहचान
सत्यपाल सिवाच
अब मैं जिसकी बात आप लोगों से करने जा रहा हूं, उस शख्स से बचपन से परिचित हूँ। छठी से नौवीं कक्षा तक हम एक साथ पढ़े हैं। बहुत बारीकी से इनके व्यवहार और विचार से परिचित हूँ। मेरे जैसे न जाने कितने साथी हैं जो इन्हें अपना सबसे खास मित्र मानते हैं। उसका कारण है – इनका निश्छल व्यवहार; निस्वार्थ रिश्ता और हर बुरे समय में साथ निभाने का जज्बा। शायद यह आजादसिंह का जीवन दर्शन है। इसीलिए संगठन और संघर्ष में यही प्रमुख रूप से दिखाई दिया।
रोहतक जिले के महम चौबीसी इलाके के गांव भैणी सुरजन – श्री टेकराम और श्रीमती दड़कां देवी के तीसरे नंबर के पुत्र आजाद सिंह ने अपने दायरे को परिवार और रिश्तेदारियों की सीमाओं से कहीं बड़ा कर दिखाया। उनका जन्म 22 अगस्त 1956 को हुआ था। सन् 1974 में दसवीं परीक्षा पास करने के पश्चात आईटीआई रोहतक से फीटर में दो वर्षीय डिप्लोमा किया। यहाँ भी हम दोनों साथ हो गए थे। मैंने स्टेनोग्राफी हिन्दी में दाखिला लिया था। तब वे दूसरे साल में थे। वे बचपन में ही आर्य समाज की पृष्ठभूमि के थे। 1968 में महीने भर गोरक्षा आन्दोलन में दिल्ली की जेल में रहे। उस समय तीसरी कक्षा के छात्र थे। आर्य समाज के प्रभाव के चलते दसवीं तक चमड़े के जूते नहीं पहने। बाद में आर्य नेता मन में उठ रहे सवालों के तर्कसंगत जवाब नहीं दे पाए तो उससे इनका धीरे-धीरे मोहभंग होता गया।
सन् 1981 में वे ऑपरेटर पद पर वर्कचार्ज के रूप में पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट में नौकरी में आ गए। वे साठ वर्ष की आयु होने पर अगस्त 2016 में रिटायर होने थे लेकिन भाजपा सरकार द्वारा फिर से अठावन वर्ष में रिटायर करने का आदेश आ गया और उन्हें दो साल पहले 30 नवंबर 2014 को ही रिटायर कर दिया गया।
पहले विभाग में पीडब्ल्यूडी मैकेनिकल वर्करज यूनियन -41 (हेड ऑफिस चरखी दादरी) बनी हुई थी। वे 1982 में इस यूनियन में भाग लेने लगे और ब्रांच स्तर पर पदाधिकारी बन गए। सन् 1983 के बाद लगातार यूनियन में केन्द्रीय कमेटी के पदाधिकारी रहे। तीन बार राज्य स्तर पर कोषाध्यक्ष रहे। एक सत्र में महासचिव भी रहे। हिसाब किताब को व्यवस्थित रखने और वार्षिक रिटर्न भरने का काम उन्होंने ही शुरू किया था। ईमानदारी का रिकॉर्ड इतना है कि उनके पास जिले की बचत के एक लाख रुपए थे। बार-बार कहने पर नहीं लिए और बाद में उन्हें भूल गए और उसके बिना ही अगला सम्मेलन करवा दिया। तब उन्होंने वह धन राज्य कमेटी के खाते में जमा करवा दिया जो किसी को याद नहीं था।
संगठन की वार्षिक डायरी निकालने की पहल भी आजाद सिंह ने की। सर्व कर्मचारी संघ के जुलूस वाले लोगो पर नेताओं के फोटो लगाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। एक बार सर्व कर्मचारी संघ की केन्द्रीय कमेटी में रहे। एक विशेष बात यह रही कि ऑल इंडिया स्टेट गवर्नमेंट इम्प्लाइज फेडरेशन के 1993 से अब तक हुए सभी सम्मेलनों में शामिल रहे। शायद यह उनका अकेले का ही रिकॉर्ड होगा।
सन् 1986-87 के आन्दोलन में भाग लेने के कारण उनको नौकरी से निकाल दिया गया, क्योंकि उस समय वर्कचार्ज सेवा थी। फिर 1993 में भी बर्खास्त किया गया। सन् 1990 में वामपंथी और मार्क्सवादी विचारों के संपर्क में आए। गांव के ही दो पुराने साथी कुलभूषण आर्य और डॉक्टर दयानन्द पहले से इस विचारधारा से जुड़े हुए थे। उन्होंने कक्षाएं लेते हुए समझाया कि ठीक दिशा के बिना संगठनों की लड़ाइयां मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगी। जेल में जाने का अवसर तो कभी नहीं मिला, क्योंकि बाहर रहकर व्यवस्था करने की ड्यूटी लग जाती थी। अन्य जो भी उत्पीड़न हुआ वह आन्दोलनों के समझौते के साथ ठीक हो जाता।
परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा और बेटी हैं। बेटे का गुजरात में अपना कारोबार है। दोनों बच्चे विवाहित हैं। बेटी रोहतक में रहती हैं। (सौजन्य ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक- सत्यपाल सिवाच
