अध्यापक आंदोलन के बहुत सुलझे, समर्पित और सहयोगी प्रकृति के लीडरः सुरजीत सिंह सैनी

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 66

अध्यापक आंदोलन के बहुत सुलझे, समर्पित और सहयोगी प्रकृति के लीडरः सुरजीत सिंह सैनी

सत्यपाल सिवाच

अचानक नायब सिंह बैंस, गादली से साथी सुरजीत के निधन का दुखदायी समाचार मिला तो बहुत पीड़ा हुई। उनका जन्म 10 दिसंबर 1955 को पंजाब के पटियाला जिले के रूड़की गांव में हुआ था। कुछ दिन बीमारी से संघर्ष करते हुए उन्होंने दिनांक 09 अगस्त 2024 को पंचकुला के अल्केमिस्ट अस्पताल में अंतिम सांस ली।

लगभग तीन साल पहले (15.07.2021) बेटे अमनदीप सिंह की असामयिक मृत्यु के बाद वे अस्वस्थ रहने लगे थे। अब परिवार में धर्मपत्नी सन्तोष और बेटी प्रीति हैं। शादी के उपरांत बेटी पटियाला में रहती हैं। लगभग 6 वर्ष की पोती है। बेटे अमनदीप की मृत्यु के पश्चात पुत्रवधू ने पुनर्विवाह कर लिया था। पोती उन्हीं के साथ ही रहती है। ऐसी स्थिति में परिवार एकाएक विकट स्थिति में पड़ गया है। परिस्थितियों को चुनौती की तरह स्वीकार करते हुए परिवार इस दुःखद घड़ी का असहनीय पीड़ा को झेल पाने के लिए संघर्षरत है।

सुरजीत सिंह सैनी अध्यापक आंदोलन के बहुत सूझवान, समर्पित और सहयोगी प्रकृति के कार्यकर्ता रहे। वे शिक्षा विभाग में आने से पहले जुलाई 1977 में थर्मल पावर प्लांट पानीपत में बतौर सुपरवाइजर नियुक्त हुए थे। दिनांक 23 अगस्त 1978 को प्राथमिक शिक्षक के रूप में राजकीय प्राथमिक पाठशाला भूखड़ी में नियुक्ति हो गई। दिनांक 02 फरवरी 1995 को वे एस.एस. मास्टर पदोन्नत हो गए; 02. दिसंबर 2004 को प्राध्यापक अंग्रेज़ी के रूप में पदोन्नति मिली। 31 दिसंबर 2013 को इसी पद से राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय दूधला–मोरथला, जिला कुरुक्षेत्र से सेवानिवृत्त हुए।

स्वर्गीय सुरजीत सिंह सैनी नौकरी में आते ही हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में सक्रिय हो गए थे। वे अमर सिंह वैद, जरनैल सिंह, शुगनचंद शर्मा, कस्तूरी लाल आदि के साथ सभी आंदोलनों व कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे थे। लगन और मेहनत को देखकर उन्हें सन 1982 में पहली बार खंड सचिव चुना गया। वे सन् 1988 तक इस पद पर लगातार तीन बार चुने जाते रहे। इसके बाद सन 1988 से 1994 तक तीन बार खंड प्रधान और सन् 1994 से 2008 तक सात बार कुरुक्षेत्र जिले के प्रधान निर्वाचित हुए। सन 2008 में राज्य कार्यकारिणी में उप महासचिव बनाया गया और सेवानिवृत्त होने तक इस पद पर रहे। इसके अलावा वे सर्वकर्मचारी संघ, हरियाणा में भी लाडवा खंड और कुरुक्षेत्र जिला इकाइयों में विभिन्न पदों पर काम करते रहे। उन्हें विभागीय नियमों की अच्छी जानकारी थी और एक सुलझे हुए व्यक्तित्व के धनी थे।

इसी पद से राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय दुगधला-मौरथला जिला कुरुक्षेत्र से सेवानिवृत्त हुए।

सुरजीत सिंह ने सन् 1980 से ही हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ की गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। 1985 में संघ को व्यक्तिवाद से बचाने के वैचारिक संघर्ष में भी सक्रिय रहे। उन्होंने सन् 1986 से सेवानिवृत्त होने तक सभी संघर्षों, धरना, प्रदर्शन, रैली, गिरफ्तारी और हड़तालों में भाग लिया था। इसके चलते कई लाठीचार्ज, गिरफ्तारी व डिटेंशन भी हुई। उन्हें 1993 की हड़ताल में बर्खास्त किया गया था जिसे समझौता होने पर निरस्त किया गया।

परिवार को अच्छे ढंग से चलाने, शिक्षक के रूप में मिशनरी होने और यूनियन के कार्यकर्ता के रूप में समय देने के साथ-साथ वे स्वाध्याय और अध्ययन के प्रति जागरूक रहे। मैट्रिक व जेबीटी से शुरू करके उन्होंने स्नातक, एम.ए. (पंजाबी व अंग्रेजी), बी.एड. और एल.एल.बी. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। सेवानिवृत्ति के पश्चात वे बार के सदस्य के रूप में कुरुक्षेत्र कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे। बेटे की अकाल मृत्यु ने उनके जीवन में ऐसी उथल-पुथल मचा दी थी कि तब से उन्होंने वकालत का काम भी छोड़ दिया था। (सौजन्य ओम सिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच

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