प्राचीन अफ्रीकी चट्टानें हमारे नीले ग्रह पर जीवन की उग्र उत्पत्ति को दर्शाती हैं

प्राचीन अफ्रीकी चट्टानें हमारे नीले ग्रह पर जीवन की उग्र उत्पत्ति को दर्शाती हैं

साइमन लैम्ब

वेलिंगटन। आपने शायद नासा के रोवर द्वारा भेजी गई मंगल ग्रह की सतह की तस्वीरें देखी होंगी। अगर कोई ऐसी ‘टाइम मशीन’ होती जो पृथ्वी के प्राचीन भूवैज्ञानिक अतीत में घूम सकती, शायद उसके आरंभिक काल तक भी जा सकती और उसी तरह की गुणवत्ता वाली तस्वीरें वापस भेज पाती, तो क्या होता?

यह कोई विज्ञान अवधारणा नहीं है। दुनिया के सुदूर हिस्सों में, भूवैज्ञानिकों ने पृथ्वी की अत्यंत प्राचीन सतह के छोटे-छोटे अवशेष खोजे हैं।

मैं इस वैज्ञानिक प्रयास का हिस्सा रहा हूं, जिसमें दक्षिण अफ्रीका के मखोनजवा पर्वत और उससे सटे छोटे देश एस्वातिनी की चट्टानों में मौजूद सूचनाओं के भंडार का अध्ययन करना शामिल है।

ये चट्टानें हमारे ग्रह के लगभग 4.6 अरब वर्षों के लंबे इतिहास के तीन-चौथाई से भी अधिक समय की हैं। अपनी नयी पुस्तक, ‘द ओल्डेस्ट रॉक्स ऑन अर्थ’ में, मैंने इस भूवैज्ञानिक टाइम मशीन द्वारा ‘‘भेजी गई’’ जीवंत तस्वीरों का वर्णन किया है।

महासागरों की दुनिया

प्राचीन चट्टानें एक ऐसी दुनिया को दर्शाती हैं जिसमें विशाल महासागर और समुद्र तल पर तीव्र ज्वालामुखी गतिविधि थी।

सुरक्षित तटीय जलक्षेत्र में जीवन पहले से ही मौजूद था, जो सूक्ष्मजीवों की परतें बना रहा था।

समय-समय पर, बड़े भूकंप चट्टानों को जबरदस्त तरीके से हिला देते थे, जिससे समुद्र के नीचे भूस्खलन हुए जो गहरे महासागर में नीचे की ओर बहते चले गए और समुद्र तल पर चट्टानों के विशाल ढेर बन गये। विशाल क्षुद्रग्रहों की टक्करों ने इस दुनिया को विचलित किया, लेकिन महत्वपूर्ण रूप से, उन्होंने इसे समाप्त नहीं किया।

बाढ़ के दौरान, बड़ी नदियां महाद्वीपीय आंतरिक भाग से मटमैला पानी लाती थीं। लेकिन वातावरण में मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड की उच्च सांद्रता समेत गैसों का एक घातक मिश्रण मौजूद था।

इन ग्रीनहाउस गैसों ने सतह को तरल जल के लिए उपयुक्त तापमान पर बनाये रखा, उस समय जब खगोल भौतिकविदों का अनुमान है कि सूर्य इतना तीव्र नहीं था। लेकिन वहां ऑक्सीजन नहीं थी।

दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित ओशिनिया क्षेत्र, इस प्रारंभिक दुनिया के स्वरूप को सबसे अच्छी तरह से दर्शा सकता है। यहां, महासागर ज्वालामुखी द्वीपों और छोटे महाद्वीपों से भरा हुआ है, जो ‘टेक्टोनिक प्लेट’ के आपस में टकराने से उत्पन्न होने वाले भीषण भूकंपों से हिलते रहते हैं। यहां तक कि जीवन की उत्पत्ति के सुराग भी मिलते हैं।

प्रयोगों से पता चलता है कि बिजली गिरने से जीवित जीवों के लिए आवश्यक बुनियादी कार्बनिक अणुओं का संश्लेषण शुरू हो सकता है।

मंगल और शुक्र ग्रह की उत्पत्ति भी संभवतः इसी प्रकार हुई होगी। लेकिन हमारा ग्रह उस अनोखे क्षेत्र में स्थित है जिसे ‘गोल्डीलॉक्स जोन’ कहा जाता है, जहां इसे सौर ऊर्जा की बिल्कुल सही मात्रा मिलती है।

‘गोल्डीलॉक्स जोन’ या रहने योग्य क्षेत्र, किसी तारे के चारों ओर का वह इलाका है जहां तापमान न ज्यादा गर्म और न ज्यादा ठंडा होता है, जिससे किसी ग्रह की सतह पर तरल पानी मौजूद रह सके, जो पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है।

यह इतना बड़ा है कि इसमें पर्याप्त चुंबकीय क्षेत्र और गुरुत्वाकर्षण बल मौजूद है जो इसके वायुमंडल को बनाए रखने के लिए पर्याप्त है।

अंततः जीवित जीवों की जैव रसायन ने पृथ्वी को इसी स्थिति में बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई होगी, क्योंकि इसने लगातार गर्म होते सूर्य के बावजूद आधारशिला को ग्रीनहाउस गैसों को अवशोषित करने में मदद की होगी। (द कन्वरसेशन)

साइमन लैम्ब विक्टोरिया यूनिवर्सिटी ऑफ वेलिंगटन से संबद्ध हैं।

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