कैलाश मनहर की कविता
वे मेरे अहंकार को तोड़ना चाहते थे
किन्तु मैं
विनम्रतापूर्वक मुस्कराता रहा
और बचाये रखा अपना स्वाभिमान
दुराग्रहों में फंसे हुये लगभग विवश
उनके पास कोई पैमाना था ही नहीं
अहंकार और स्वाभिमान में फर्क़ करने का
जबकि अपने विवेक को सदैव संजोये हुये
मैं उनकी चालाकी को अच्छी तरह
समझ कर अपना मार्ग बनाता रहा
कोई एक संकेत करता था छुप कर
दूसरा कोई संकेतों के अनुसार चलाता था
विषैले तीर और कपटपूर्ण तरीक़े से
मुझे मैदान से हटाने के लिये प्रयत्न करते
वे हर बार गंदगी में गिरते जा रहे थे
मेरे शुभेच्छु होने का स्वांग करते हुये
बेशर्मी से
अपनी कॉलर उठा कर चलते
चाहे कितने भी गर्वित बने रहें किन्तु
अपने एकांत में वे पछताते ज़रूर थे
